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Almora News: दीवान कनवाल के गीत सदियों तक उनकी उपस्थिति का कराएंगे अहसास

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अल्मोड़ा। मशहूर लोक गायक दीवान कनवाल के गीत लोगों के दिलों को छूू जाते हैं। भले ही अब वह इस दुनिया में नहीं रहे लेकिन उनके गाए गीत उनकी उपस्थिति का हमेशा अहसास कराएंगे। अल्मोड़ा के नंदादेवी मेले में उनकी कमी हमेशा खलेगी। मंच पर उनके गीत गाते ही सैकड़ों लोग झूमने लगते थे।
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दीवान कनवाल ने कई गीतों को अपनी आवाज दी। उन्होंने कारगिल का बादवा जा तू मेरा घर मेरी ईज बौज्यू की ले आ कुशला... गीत गाया तो यह छा गया। कारगिल युद्ध के दौरान सैनिकों की घर वापसी या उनके घर संदेश भेजने संबंधित यह गीत आज भी सीमाओं पर फौजी गुनगुनाते हैं। उनके गीतों में नारी सौंदर्य की भी झलक देखने को मिलती है। उनका गाया सौ बानो की एक बान तू, बड़नै अब मै तेरि क्या करु...नारी सौंदर्य पर आधारित है। उनके गीतों में पहाड़ के लोक जीवन, संघर्ष, दुख दर्द की भी झलक दिखाई देती है। मै डाना रूनै रई, मै काना रूनै रई एकलि पराणि कां कां नै गयूं.. गीत पहाड़ की पीड़ा को बया करता है। उनके गीतों में आस्था और भक्ति का संगम भी दिखाई देता है। उनका गाया गीत ओ नंदा सुनंदा तू दैण है जाए है.. आज भी कई मचों पर गाया जाता है। पति-पत्नी के बीच होने वाली हल्की नोकझोंक भी इनके गीतों में दिखाई देती है। वरिष्ठ कवि विपन जोशी कोमल ने बताया कि दीवान कनवाल की गायकी में पहाड़ की कसक थी, वहीं नारी सौंदर्य, यहां के लोक-जीवन का जीवंत चित्रण भी है। उनके गाए गीत सदियों तक उनकी मौजदूगी का अहसास कराएंगे। संवाद

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दीदी कहकर बुलाता था...अब हमेशा के लिए हुआ खामोश

वरिष्ठ लोक गायिका लता ने दीवान के साथ कई मंचों पर गाए गीत

अल्मोड़ा। दीवान कनवाल के निधन की सूचना मिलने पर उनके साथ मंच साझा करने वाली वरिष्ठ लोक गायिका लता पांडे के नैनों से नीर छलक पड़ा। रूधे हुए गले से बोली वह हमेशा मुझे दीदी कहकर बुलाते थे लेकिन अब उनकी ये आवाज कभी सुनाई नहीं देगी।
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वरिष्ठ लोक गायिका लता पांडे ने कहा कि आकाशवाणी और अन्य मंचों पर दीवान कनवाल के साथ गाने का मौका मिला। मंच पर उनके साथ गाने में अलग आनंद का अनुभव होता था। वह खुद बड़े लोक गायक थे लेकिन कभी भी मंच साझा करते हुए उन्होंने इस बात का अहसास नहीं होने दिया। गायन की शैली को लेकर वह हमेशा सुझाव देते थे। कमियां भी बताते थे तो उत्साहवर्धन भी करते थे। मेरी आवाज को बहुत पसंद करते थे। कहते थे दीदी आपकी आवाज काफी मधुर है। आपकी आवाज में सरस्वती है। उनकी कही ये बातें मझे और अधिक मेहनत करने के लिए प्रेरित करतीं। आज जब उनके निधन की खबर मिली तो मैं सन्न रह गई।

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लोक गायक बोले- बहुत याद आओगे दीवान दा

दीवान कनवाल ने अपने गीतों, रचनाओं और प्रस्तुतियों के माध्यम से संस्कृति और संगीत की समृद्ध परंपरा को जीवित रखा। उन्होंने कई कलाकारों को प्रेरित किया और आज कमाल का गायन कर रहे हैं। लोक संगीत, पारंपरिक धुनों को संरक्षित करने में उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा। - प्रकाश बिष्ट, निदेशक संस्कार सांस्कृतिक व पर्यावरण संरक्षण समिति

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दीवान ने उत्तराखंड की लोक संस्कृति को अपने गीतों के जरिये जन-जन तक पहुंचाया। उनके यूं ही चले जाने से लोक संगीत जगत को भारी क्षति पहुंची है जिसकी भरपाई नामुमकिन है। उनके गीत हमेशा उनकी उपस्थित का अहसास दिलाएंगे। - गोपाल सिंह चम्याल, अध्यक्ष कुमाऊं लोक कलाकार महासंगठन

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दीवान कनवाल जैसे मशहूर गायक का यूं चला जाना काफी पीड़ादायक है। शेरदा अनपढ़ के गीत द्वी दिना का ड्यार शेरूआ..गीत को अपनी आवाज दी। संगीत जगत में उनके योगदान को हमेशा याद किया जाएगा। - नवीन बिष्ट, वरिष्ठ कवि और गीतकार अल्मोड़ा


दीवान के निधन से लोक संस्कृति को क्षति पहुंची है। उन्होंने कई नवोदित कलाकारों को प्रोत्साहित किया जो आज अच्छे गायक हैं। सांस्कृतिक नगरी ने एक महान लोक गायक को खो दिया है जिसकी भरपाई मुश्किल है। - गोकुल बिष्ट, निदेशक नव हिमालय लोक कला केंद्र अल्मोड़ा
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कुमाऊं लोक संगीत को जन-जन तक पहुंचाने में दीवान कनवाल का बहुत बड़ा योगदान रहा है। उनकी गायकी में पहाड़ की कसक थी। भले ही वह दुनिया से चले गए हैं लेकिन उनके गीत बजते ही वह बहुत याद आएंगे। -डॉ. हयात सिंह रावत, वरिष्ठ साहित्यकार अल्मोड़ा


दीवान कनवाल ने लोक गीतों और कविताओं के माध्यम से कुमाऊंनी भाषा को विश्व पटल पर अलग पहचान दिलाई। संगीत जगत में उनके योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा। उनके असमय दुनिया से चला जाना काफी दुखदायी है। -श्याम सिंह कुटौला, वरिष्ठ कवि और लेखक अल्मोड़ा
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