रानीखेत (अल्मोड़ा)। उद्यान निदेशालय की स्थापना को 62 साल हो चुके हैं, लेकिन आज तक ठोस उद्यान नीति नहीं बन पाई है। आधुनिक शोध और तकनीकों का लाभ तक किसानों को नहीं पहुंच पाता। राज्य बनने के बाद निदेशालय के दिन बहुरने की उम्मीद थी, लेकिन इस दौरान बने अधिकांश निदेशक अपना कार्यकाल तक पूरा नहीं कर पाए हैं। पिछले चार-पांच सालों से निदेशकों ने भी यहां नियमित रूप से बैठना बंद कर दिया है। जिस कारण कर्मचारियों को फाइलें लेकर देहरादून की दौड़ लगानी पड़ती है। जिसके चलते उद्यान विकास को लेकर पूरे राज्य में निराशा का माहौल है।
1953 में निदेशालय के विक्टर साने निदेशक बने। उन्होंने पर्वतीय क्षेत्र में शीतोष्ण फल प्रजातियों के साथ ही घाटियों में आम और मसाला, सब्जी, शहद, पुष्प आदि के उत्पादन की नीतियां बनाईं। 1958 में आनंद प्रकाश गुप्ता और देवकी नंदन श्रीवास्तव ने विभाग का नेतृत्व किया। बताते हैं कि इसके बाद 1984 तक उद्यान विशेषज्ञ डा. शिवराज सिंह तेबतिया ने विकास और शोध कार्यक्रमों के बीच तालमेल स्थापित करते हुए उद्यान को गति प्रदान की। 1989 में डा. जेएन सेठ को निदेशक बनाया गया, उन्होंने स्थानीय भूगोल और जलवायु के मुताबिक स्थानीय प्रजातियों को विकसित करने का प्रयास किया।
वरिष्ठ विभागीय अधिकारियों के अनुसार 1991 के बाद निराशाजनक दौर शुरू हुआ। इस बीच परंपरागत योजनाओं के साथ ही कृषि विविधीकरण परियोजना डास्प पर भारी धन खर्च हुआ। बाद में केंद्र पोषित हॉल्टीकल्चर टेक्नोलॉजी मिशन शुरू हुआ । राज्य बनने के बाद उद्यान निदेशालय की दशा सुधरने की उम्मीद थी, लेकिन निदेशक ही कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। 2005 तक कई विभागीय अधिकारियों के साथ प्रशासनिक और आईएफएस निदेशक तैनात किए गए। 2005 में हिमाचल के वैज्ञानिक डा. डीआर गौतम को प्रतिनियुक्ति पर लाया गया तो उन्होंने सेब की स्थानीय प्रजातियों के बजाए विदेशी प्रजातियों को तवज्जो दी।
2009 में डा. बीपी नौटियाल निदेशक बने, उन्होंने नए सिरे से उद्यान गणना का सुझाव रखा था, लेकिन डेढ़ साल बाद वह विवादों के साए में घिर गए। 2011 में आईएफएस जीएस पांडे निदेशक बने। यहीं से निदेशकों ने चौबटिया में बैठना काफी कम कर दिया। 2011 में डा. आई खान निदेशक बनाए गए। वह भी तीन साल पद पर रहे। 2015 में डा.बीएस नेगी निदेशक का कार्यभार संभाल रहे हैं।
रानीखेत। उद्यान विशेषज्ञ और प्रगतिशील काश्तकार प्रेम गिरि गोस्वामी का कहना है कि कि विदेशी सेब की प्रजातियां खर्चीली होने के कारण किसानों के लिए कारगर नहीं हैं। विकास और शोध के कार्यक्रमों में तालमेल नहीं है। बार बार निदेशक बदलने और अनावश्यक राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण भी यह स्थिति पैदा हुई है।
चौबटिया के उद्यान निदेशक डा. बीएस नेगी बताते हैं कि देहरादून में आए दिन शासन स्तर के कार्य निपटाने पड़ते हैं। हालांकि प्रतिदिन वह चौबटिया निदेशालय की प्रगति रिपोर्ट लेते रहते हैं। उद्यान निदेशालय की कायापलट के लिए 50,000 से अधिक विभिन्न फल प्रजातियों के पौधे तैयार किए जा रहे हैं।
इस साल तीन हजार पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया है, जिनमें 2500 रेड डेलीसस सेब प्रजाति के पौधे लगाए जाने हैं। 200 पौधे बादाम प्रजाति के लगाए जाएंगे। राष्ट्रीय बागवानी मिशन के सहयोग से चौबटिया उद्यान में एक अखरोट नर्सरी भी विकसित करने की योजना है।