पिता... किसी परिवार का आधार होता है। बच्चों के बेहतर भविष्य के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पिता की असमय मृत्यु हो जाए तो संतान बेसहारा हो जाती है। ऐसा ही एक वाकिया हवालबाग में हुआ, जहां तीन बच्चे पहले मां की ममता से दूर हुए और फिर पिता का साया चला गया। इस दौरान ताऊ ने उनकी जिम्मेदारी ली और माता-पिता की कमी महसूस नहीं होन दी। अल्मोड़ा के हवालबाग ब्लाक के ज्योली गांव निवासी भुवन सिंह सलाल (45) छोटे भाई आनंद सिंह की सवा साल पहले मौत हो गई। उनकी पत्नी का काफी समय पहले ही निधन हो चुका था। दोनों के न रहने से उनके तीन बच्चे अनाथ हो गए।
दिवंगत भाई के तीन बच्चों के भरण-पोषण और पढ़ाई का सवाल खड़ा हो गया। भुवन सिंह ने हिम्मत रखी और मानवता को सर्वोपरि रखा। अनाथ हुए भाई के दो बच्चों को अपने परिवार के साथ ले लिया। भुवन बच्चों को पिता तो उनकी पत्नी गीता मां का साया दे रही हैं। वह मजदूरी कर अपने तीन बच्चों के साथ ही इनके भरण-पोषण और पढ़ाई का खर्चा उठा रहे हैं।
तीसरे की जिम्मेदारी चाचा ने ली
आनंद सिंह के तीन बच्चे हैं। इनमें से पुत्री आरती 12वीं में पढ़ रही है और बड़ा पुत्र दीपक 10वीं और छोटा पुत्र करन नौवीं का छात्र है। आरती व दीपक की जिम्मेदारी भुवन संभाल रहे हैं, जबकि करन की परवरिश का जिम्मा भुवन के चाचा चंदन सिंह ने ली है। वे उसे अपने साथ बनारस ले गए हैं।
आवासीय मकान भी जर्जर
गरीबी के कारण आनंद सिंह अपने मकान की मरम्मत भी नहीं करा सका। जर्जर होने के कारण उसका मकान रहने योग्य नहीं है। ऐसे में उसके बच्चों के रहने के लिए घर तक नहीं है। भुवन सिंह ने इन बच्चों को अपने ही घर में आश्रय दिया है। संवाद
फोटो: 14एएलएम 17पी: मां-बाप का साया खो चुका बालक।
:::: चंदन नेगी
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बेटियों की पढ़ाई के लिए अपने सुखों को भूले हरीश
प्रसव के दौरान हो गया था पत्नी का निधन
बागेश्वर। मन्यूड़ा के हरीश राम पिछले सात साल से माता और पिता दोनों की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। प्रसव के दौरान पत्नी के निधन के बाद उन्होंने अपना जीवन दो बेटियों के लालन-पालन में लगा दिया। सामान्य नौकरी करने के बावजूद उनका लक्ष्य बेटियों को अच्छी शिक्षा दिलाकर उनको कामयाब बनाना है।
करीब 49 साल के हरीश राम की दो बेटियां हिमानी और प्रतीक्षा हैं। हिमानी कक्षा छह में और प्रतीक्षा कक्षा तीन में पढ़ती है। हरीश बताते हैं कि करीब सात साल पहले प्रसव के समय उनकी पत्नी सुनीता देवी का निधन हो गया था। उस समय छोटी बेटी डेढ़ साल की थी। अचानक दो छोटी बेटियों की जिम्मेदारी उनके सिर पर आ गई। परिवार में कोई दूसरा देखने वाला भी नहीं था। ऐसे में बेटियों की देखभाल के लिए दूसरी शादी का विकल्प था, लेकिन मन नहीं माना। खुद ही बेटियों को पालने और पढ़ाने की ठान ली। हरीश कहते हैं कि अब उनके जीवन का उद़्देश्य बेटियों की अच्छी परवरिश करना है। संवाद
फोटो 14 बीजीएस 20 पी
सीएमओ दफ्तर में 1992 में हुई
फर्जी नियुक्ति, अब मुकदमा दर्ज
फर्जी नियुक्ति मामले में
33 साल बाद केस दर्ज