रानीखेत (अल्मोड़ा)। लोकतंत्र में चुनाव प्रक्रिया को 64 साल पूरे हो गए हैं। इसी दौरान चुनावी प्रक्रिया में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं। आजादी के बाद पहले आम चुनाव में कांग्रेस, जनसंघ ही देश में मुख्य दल थे। इस दौर में कांग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी तो जनसंघ का चिन्ह दीया और बाती होती थी।
करीब दो दशकों तक इन्हीं चुनाव चिन्हों के साथ प्रत्याशी मैदान में उतरे। बताते हैं कि 1974 में जब मोरारजी देसाई पार्टी से अलग हुए तो कांग्रेस को गाय के साथ दूध पीता बछड़ा चुनाव चिन्ह मिला। प्रचार के दौरान इंदिरा तेरो चुनाव चिन्ह गोरु दगड़ि बाछ गीत काफी लोकप्रिय हुआ, जबकि जनसंघ जनता दल में तब्दील हुई और चुनाव चिन्ह हलधर किसान आवंटित हुआ।
1975 में आपातकाल के बाद जब 1980 में कांग्रेस हाथ चुनाव चिह्न के साथ पुन: सत्तासीन हुई, जबकि जनता पार्टी कमल के फूल चुनाव चिन्ह के साथ भारतीय जनता पार्टी नाम से महासमर में कूदी। 1952 में जब पहले चुनाव का बिगुल बजा तो प्रचार से लेकर मतदान तक की पूरी प्रक्रिया सादगीपूर्ण ढंग से संपन्न हुई थी, लेकिन 70 का दशक आते ही चुनाव महासमर में तब्दील हो गए। प्रचार का तरीके बदलने लगे। दलों में धड़ेबाजी भी इसी दशक की देन मानी जाती है। यहां तक की महासमर के लिए राजनैतिक दलों ने चुनाव चिन्ह तक बदल दिए। वर्तमान दौर में चुनाव के मायने ही बदल गए हैं।