मोहनरी (अल्मोड़ा)। देश को आजाद हुए 69 साल हो गए हैं, लेकिन पर्वतीय क्षेत्र के गांवों में खुशहाली नहीं आ पाई है। प्रदेश के मुख्यमंत्री हरीश रावत के पैतृक गांव मोहनरी का भी यही हाल है। आजादी के बाद बुनियादी सुविधाओं में इजाफा तो हुआ, लेकिन राज्य बनने के बाद गांव के विकास के लिहाज से बड़ा बदलाव नहीं आ सका। जंगली जानवरों के आतंक के चलतेे अर्थव्यवस्था की रीढ़ समझी जाने वाली खेती-किसानी से लोग मुंह मोड़ रहे हैं।
रोजगार के लिए गांव से अधिकांश युवा तराई क्षेत्रों का रुख कर चुके हैं। बातचीत के दौरान ग्रामीणों के चेहरे पर जंगली जानवरों के आतंक की पीड़ा साफ झलक रही थी। मोहनरी गांव अल्मोड़ा जिले की भिकियासैंण तहसील के अंतर्गत है। हरीश रावत के मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही यह गांव सुर्खियों में आया था। गांव के 60 परिवारों में से अब 52 परिवार निवास करते हैं।
गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं है। लोग प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सिरमोली जाते हैं। वहां एक प्राइमरी स्कूल, एक जूनियर हाईस्कूल है, जबकि नजदीकी इंटर कॉलेज चौनलिया में है। ग्रामीण दलजीत सिंह रावत का कहना है कि अच्छी शिक्षा और रोजगार के लिए युवा तराई-भाबर में चले गए हैं।
गांव में सुअर, बंदर आदि जंगली जानवरों का आतंक है। पहले यहां मंडुवा, झुंगरा, भट्ट, गहत जैसे पारंपरिक अनाज अधिक पैदा होता था, लेकिन अब नहीं होता। खेती की कमर तोड़ने में प्राकृतिक आपदा का रोल भी अत्यधिक है। अत्यधिक बारिश के कारण इस बार मिर्च भी नहीं हो पाई है।
85 वर्षीय वृद्धा ललिता देवी ने बताया कि जंगली जानवरों के आतंक से खेत बंजर हो रहे हैं, जबकि पहले गांव के खेत सोना उगलते थे। वृद्धावस्था पेंशन जरूर आ रही है। ग्रामीण पूरन सिंह का कहना है कि गांव में पैदल रास्तों की हालत खराब है। रोजगार के संसाधन विकसित नहीं हो पा रहे हैं। पहले की तरह अब खेतों में कुछ भी पैदा नहीं हो रहा है। नंदन सिंह ने कहा कि खेतों में जानवरों से रक्षा करने के लिए कपड़े के झंडे गाड़े गए हैं।