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वातावरण में आ रहा बदलाव, बादल फटने की घटनाओं के लिए जिम्मेदार

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अल्मोड़ा। मई में पश्चिमी विक्षोभ से उत्तराखंड में बादल फटने की घटनाएं शुरू हो गईं हैं, जबकि अभी मानसून आने में करीब दो माह का समय बाकी है।
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हिमालयी पर्यावरण वैज्ञानिक इसके लिए वातावरण में हो रहे बदलाव को जिम्मेदार मान रहे हैं। उनका मानना है कि अगर स्थिति को नहीं संभाला गया तो भविष्य में यह समस्या और भी विकराल हो जाएगी।
जीबी पंत हिमालयी पर्यावरण संस्थान कोसी कटारमल के वैज्ञानिक डॉ. जेसी कुनियाल ने बताया कि बादल फटने की घटनाओं के लिए गर्म और ठंडी हवा का टकराव जिम्मेदार होता है।
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जब वातावरण में ठंडी और गर्म हवाएं एक साथ आ जातीं हैं, तब इनका आपस में टकराव होता है। ऐेसे समझें कि आसमान में विस्फोट हो जाता है।
वहां पर बिजली कड़कने की तेज आवाज के साथ बादल फटने की घटना होती है। इसके बाद बहुत सारा पानी एक साथ ही बरस जाता है और तबाही मच जाती है।
डॉ. कुनियाल ने बताया कि इस समय पश्चिमी विक्षोभ से आ रही हवा में नमी है और वह ठंडी है। इधर स्थानीय स्तर पर वातावरण में लगातार बदलाव हो रहा है। जंगलों में आग की घटनाओं और बढ़ते प्रदूषण की वजह से पहाड़ी इलाकों में तापमान बढ़ रहा है।
इसकी वजह से तापमान में अनियमित बदलाव आ रहे हैं। इससे सुबह के समय सामान्य से ज्यादा गर्म तो वहीं रात के समय सामान्य से ज्यादा ठंड हो रही है। गर्मियों और सर्दियों के मौसम में भी तापमान में सामान्य के मुकाबले बदलाव देखने को मिलता है।
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कहा कि स्थानीय स्तर पर बढ़ने वाले प्रदूषण और तापमान का जब नम हवाओं से टकराव होता है तो बादल फटने की घटनाएं होना स्वाभाविक हैं। इस बार जंगल में आग की अत्यधिक घटनाएं भी इसके लिए जिम्मेदार हैं।
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