अल्मोड़ा। पुराने समय में शहर की पेयजल व्यवस्था का प्रमुख साधन रहे परंपरागत नौले उपेक्षा के कारण लुप्त होते जा रहे हैं। शहर के
बचे हुए कुछ नौले काफी बदहाल स्थिति में पहुंच गए हैं। इनके सुधारीकरण के लिए कोई काम नहीं हुआ है। प्रशासन की उदासीनता के चलते कई नौलों में पानी होने के बावजूद नौलों में कूड़े के ढेर लगे हुए हैं।
नगर और आसपास के क्षेत्रों में एक समय 365 नौले लोगों की प्यास बुझाते थे। इनमें चम्पानौला, घासनौला, मल्ला नौला, कपीना नौला, सुनारी नौला, उमापति का नौला, बालेश्वर नौला, बाड़ी नौला, नयाल खोला नौला, खजांची नौला, हाथी नौला, डोबा नौला, दुगालखोला नौला आदि मुख्य हैं। अधिकतर नौले लुप्त हो गए हैं। बचे नौले भी उपेक्षा की मार झेल रहे हैं। कई स्थानों पर नौले अतिक्रमण की चपेट में आकर समाप्त हो गए हैं। वर्तमान में नगर क्षेत्र में लगभग 50 नौले ही रह गए हैं।
इनमें से सात नौले ही ठीक स्थिति में हैं। बाकी नौले काफी बदहाल स्थिति में पहुंच गए हैं जिनका अभी तक जीर्णोद्धार नहीं
हो सका है। घरों में पेयजल लाइन आने से नौले उपेक्षित हो गए और अपने अस्तित्व खोते जा रहे हैं। नौले के सुधारीकरण के
लिए बनाई गई योजना तो बहुत बनाई जाती हैं लेकिन धरातल पर योजनाएं चलती ही नहीं।
माल रोड से सटे थपलिया के नौले की हालत काफी खराब है जहां पानी तो उपलब्ध है पर उपेक्षा के चलते नौले के चारों तरफ कांच और प्लास्टिक की बोतलें, पॉलीथिन और कूड़े का ढेर लगा हुआ है। ऐसे ही कितने नौले हैं जहां पानी तो है पर इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। जिले में बढ़ रही पानी की दिक्कतों को कम करने के लिए हमारी प्राचीन संस्कृति, लोक संस्कृति के प्रतीक रहे नौलों के संरक्षण के लिए सभी को अपना योगदान देने की जरूरत है।