तेंदुए के आतंक के चलते सबसे ज्यादा परेशानी दूर गांव के उन विद्यार्थियों को हो रही है जो प्रतिदिन घनघोर जंगलों से गुजरकर स्कूल पहुंचते हैं।
छात्र-छात्राओं के साथ उनके अभिभावकों के लिए भी जोखिम कम नहीं है, परंतु यह उनकी हिम्मत ही है जो कि वह जंगली जानवरों के संभावित हमले की परवाह किए बगैर अपने दैनिक कार्यों को अंजाम दे रहे हैं।
दहशत भरे इस माहौल में इन्हीं विद्यार्थियों के क्षेत्र के कुछ पत्रकारों ने भी जंगल के बीच पांच किलोमीटर का रास्ता तय कर हकीकत जानने की कोशिश की।
राजकीय इंटर कालेज महाकालश्वर में कक्षा दस में पढ़ने वाली बसीगाड़ की श्वेता, बमनगांव की लता और प्रीति और भटांणा की अंजू को प्रतिदिन स्कूल आने-जाने में दोनों तरफ मिलाकर कुल करीब चार से पांच किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है।
स्कूल में छुट्टी होने के बाद चारों छात्राएं महाकालेश्वर से गांव की ओर चल दीं। कुछ दूरी पर बमनगांव जाने वाली दो छात्राएं दूसरे रास्ते पर चली गईं तो कुछ आगे तक साथ चली छात्राएं भी अकेले हो गई।
एक ने भटांण का रास्ता अकेले ही तय किया जबकि बसीगाड़ जाने वाली छात्रा की मां उसेे लेने आधे रास्ते में बैठी मिली। इस क्षेत्र में एक गाय और बकरी आदि को अपना निवाला बना चुका तेंदुआ एक युवक पर भी झपट चुका है।
लोगों का कहना है कि तेंदुआ किसी भी क्षण आकर राह चलते किसी भी व्यक्ति पर हमला कर सकता है। ऐसे में महिलाओं के लिए खेतों में काम करना मुश्किल हो गया है। गांव में तेंदुए के आने की सूचना मिलते ही लोग लाठी-डंडों के साथ संबंधित स्थान की तरफ दौड़ पड़ते हैं।
क्षेत्र में तेंदुए का आतंक ज्यादा होने के चलते स्कूली बच्चे किसी बड़े के साथ का इंतजार करते हैं, परंतु कुछ अपवादों को छोड़ अधिकांश समय उन्हें अकेले ही रास्ता तय करना पड़ता है। जंगल से गुजरने के दौरान आंधी-तूफान या फिर बारिश में तेंदुए का और भी ज्यादा खतरा पैदा हो जाता है।
जंगली जानवरों के आतंक से मैहलचौरा, चितैली, महांकालेश्वर और बमनगांव ही नहीं बल्कि तमाम दूरस्थ गांव का जीवन बदतर हो गया है।
विकास खंड के खजुरानी जैसे दर्जनों गावों के लोग प्रतिदिन जंगलों के बीच जोखिम भरे रास्तों से गुजरकर किसी तरह गंतव्य पर पहुंचते हैं। घर वापसी तक परिजनों को चिंता बनी रहती है परंतु घर से निकलना भी ग्रामीणों की मजबूरी होती है।