रासायनिक उत्पादों के बढ़ते दुष्प्रभाव के कारण लोग अब जैविक खेती की ओर अग्रसर हो रहे हैं। मजखाली स्थित राज्य जैविक कृषि प्रशिक्षण एवं अनुसंधान केंद्र में जैविक खेती का प्रशिक्षण लेने के लिए लोग भूटान से भी पहुंच रहे हैं। पारंपरिक जैविक व्यंजन भट के डुबके प्रशिक्षणार्थियों की पहली पसंद बने हैं।
प्रशिक्षण के साथ पारंपरिक जैविक व्यंजनों भट की चुटकाणी, गहत के डुबके, झंगोरे की खीर, गढेरी की सब्जी, बिच्छू घास की सब्जी का भी आनंद ले रहे हैं। नैनी कृषि विश्वविद्यालय इलाहाबाद से आए प्रगतिशील कृषकों के अलावा भूटान में विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रहे युवक-युवतियों का दल भी प्रशिक्षण ले चुका है। भूटान से आए कर्मा पिंजोर, एनबी टनमय, त्रिशेंग गंबू, थूजी पिंजोर आदि का कहना है कि उत्तराखंड जैविक खेती का प्रमुख प्रशिक्षण स्थल बन रहा है। वह लोग भविष्य में भी यहां आकर प्रशिक्षण लेंगे।
जैविक व्यंजनों में भट्ट की चुटकाणी, गहत के डुबके और बिच्छु घास की सब्जी पसंद आई। गुजरात, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली से लोग भी यहां जैविक खेती के गुर सीखकर वापस लौट चुके हैं। केंद्र के प्रभारी डा देवेंद्र सिंह नेगी ने बताया कि प्रशिक्षणार्थियों को समेकित जैविक कृषि प्रणाली, जैविक मुर्गी, जैविक मशरुम, मधुमक्खी पालन आदि का प्रयोगात्मक कार्य भी दिखाया गया। पर्वतीय क्षे़त्र की पादप बनस्पतियों जैसे बकैन, खिन, रामबांस, धतूरा, बिच्छु घास, कुंज, अखरोट, तिमूर से बनाई जाने वाली कीटनाशक, गोमूत्र और गोबर से बनाई जाने वाली खादों की जानकारी भी दी जा रही है। प्रशिक्षण में मनोहर सिंह, सुमन मद्दान, अमित श्रीवास्तवआदि भी सहयोग कर रहे हैं।