पर्वतीय क्षेत्र में पशुपालकों के मवेशियों के लिए चारे की समस्या दूर होने की उम्मीद है। राज्य बनने के बाद उपेक्षित पड़े अल्मोड़ा के विश्वनाथ के समीप भैंसवाड़ा फार्म में चारा घास का उत्पादन शुरू कर दिया गया है। पशुपालन विभाग फार्म में विभिन्न प्रजाति की चारा घास के बीज भी तैयार करेगा और बीज पशुपालकों को वितरित करेगा, ताकि पशुपालकों को जाड़े, गरमी के सीजन में मवेशियों के लिए चारे की कमी नहीं रहे।
37 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले भैंसवाड़ा फार्म में उत्तर प्रदेश शासनकाल में उत्तराखंड चारा विकास परियोजना संचालित की गई थी। यहां से काश्तकार घास का बीज और पौध ले जाकर खेतों में बोते थे। इससे जाड़े और गरमी के सीजन में पशुओं के लिए चारे की समस्या नहीं रहती थी। यूपी शासनकाल में परियोजना समाप्त होने और पृथक उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से यह फार्म उपेक्षित पड़ा था। इस फार्म को अन्य कार्यों के लिए उपयोग में लाने के प्रयास होते रहे, लेकिन सफल नहीं हो सके।
पर्वतीय क्षेत्र में गरमी और जाड़े के मौसम में पशुपालकों के सम्मुख मवेशियों के लिए चारे की समस्या रहती है। इसको देखते हुए पशुपालन विभाग ने फार्म में चारा उत्पादन करने का प्रस्ताव शासन को भेजा था। एकीकृत आजीविका सहयोग परियोजना उत्तराखंड से फार्म में चारा उत्पादन के लिए 65 लाख रुपये मिले हैं। पांच लाख की धनराशि से फार्म की चहारदीवारी का कार्य किया गया है। फार्म के प्रभारी वरिष्ठ पशु चिकित्साधिकारी डा. आरए दीक्षित ने बताया कि फार्म में फिलहाल छह हेक्टेयर क्षेत्र में चारा घास का उत्पादन शुरू किया गया है। फार्म में पर्वतीय क्षेत्र की मुफीद बहुउद्देश्यीय घास की विभिन्न प्रजातियां बोई गई हैं। फार्म में दस मजदूर काम कर रहे हैं। चारा सुपरवाइजर का पद रिक्त पड़ा है।
फार्म में बोई गई विभिन्न प्रजातियों की घास
अल्मोड़ा। फार्म में पर्वतीय क्षेत्र की मुफीद दोलनी, गुच्छी, राई, ब्रोम, सीता, गुणी, सफेद क्लोवर, चायना कैवेज, जर्मन की कुकई घास बोई गई हैं। यह घासें मवेशियों के लिए काफी पौष्टिक भी हैं। डा. आरए दीक्षित ने बताया कि चायना कैवेज घास का 1.7 क्ंिवटल, राई घास का आठ क्ंिवटल बीज तैयार किया गया है। अन्य घासों का भी बीज तैयार किया जाएगा। काश्तकारों को बीज आजीविका परियोजना, स्वयं सेवी संस्थाओं और भैंसवाड़ा फार्म से दिया जाएगा।