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उद्यान निदेशालय अन्यत्र शिफ्ट करने की योजना का चौतरफा हो रहा विरोध

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रानीखेत (अल्मोड़ा)। पर्यटन नगरी की पहचान से जुड़ा चौबटिया के उद्यान निदेशालय को देहरादून शिफ्ट करने की तैयारी से प्रगतिशील काश्तकारों और जनसंगठनों के लोगों में आक्रोश है। उनका कहना कि आजादी के बाद स्थापित यह रिसर्च सेंटर एक समय में सेब उत्पादन का प्रमुख केंद्र था। निदेशक यहां बैठते थे, वैज्ञानिकों अधिकारियों की फौज से पहाड़ से काश्तकार लाभान्वित हो रहे थे। राज्य बनने के बाद निदेशालय निरंतर रसातल में चला गया। कहा कि एक तरफ पलायन रोकने की सरकार योजना बना रही है, दूसरी तरफ पहाड़ से कृषि, उद्यान से जुड़े निदेशालयों को अन्यत्र शिफ्ट करने की तैयारी की जा रही है। इससे किसानों में निराशा है।
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-उद्यान विभाग का मुख्यालय स्थापित कर तत्कालीन जरूरतों को पूरा करने के लिए स्थानीय लोगों को फल और सब्जी उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया गया। परिणाम स्वरूप गगास और खैरना की घाटियां फल और सब्जी उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हो गईं। राज्य बनने से पहले तक उद्यान निदेशालय में सभी शोध कार्य हो रहे थे, लेकिन राज्य बनने के बाद उद्यान निदेशालय रसातल में चला गया। इसकी महत्वपूर्ण यूनिट को पंतनगर कृषि विवि में मर्ज कर दिया गया। निदेशालय को दून स्थानांतरित करने की योजना दुर्भाग्यपूर्ण है।-दिनेश तिवारी, पूर्व उपाध्यक्ष, विधि आयोग।
-सरकार क्या संदेश देना चाहती है। एक तरफ पलायन रोकने की बात हो रही है, दूसरी तरफ रानीखेत की पहचान से जुड़े चौबटिया उद्यान निदेशालय को देहरादून शिफ्ट करने की योजना बन रही है। इससे किसान हताश हैं। पहाड़ के किसानों के हक में निदेशक को यहां नियमित रूप से बैठना चाहिए। पहाड़ के औद्यानिक विकास की परिकल्पना को लेकर ही चौबटिया में निदेशालय की स्थापना की गई थी। पहले रिसर्च सेंटर बंद कर दिया गया। पहाड़ से पलायन रोकने का मुख्य जरिया ही उद्यान और कृषि है। सरकार इनके निदेशालयों को बाहर शिफ्ट है, जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है। -गोपाल उप्रेती, प्रगतिशील काश्तकार, बिल्लेख रानीखेत।
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-उत्तर प्रदेश के समय पर्वतीय क्षेत्र की आवश्यकताओं और विकास की संभावनाओं को ध्यान में रखकर चौबटिया में उद्यान निदेशालय की स्थापना की गई थी। अब यदि सुविधाभोगी नौकरशाही के दबाव में निदेशालय को देहरादून ले जाने का प्रयास किया जा रहा है तो यह राज्य तथा औद्यानिक विकास विरोधी कदम होगा। इस विषय को मुख्यमंत्री के संज्ञान में लाया जाएगा। निदेशालय यहीं रहे इसके लिए प्रयास होंगे। वैसे भी यूपी और उत्तराखंड में इस निदेशालय के अवस्थापना पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं।
-नरेंद्र रौतेला, पूर्व दर्जा राज्य मंत्री।
-सरकार का यह कैसा पहाड़ प्रेम है। एक तरफ गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया जा रहा है, वहीं 70 किमी दूरी पर स्थित प्राचीन उद्यान निदेशालय को देहरादून ले जाने की तैयारी की जा रही है। यह सरकार का दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय है। निदेशालय का संचालन अन्य विभागों की तरह ही देहरादून से हो रहा है उत्तराखंड राज्य की सभी सरकारों ने इसकी स्वायत्तता राज्य के उद्यान के विकास के लिए इसकी उपयोगिता को नष्ट किया है। इससे पहले जड़ी-बूटी शोधसंस्थान, दूरसंचार विभाग का मुख्यालय, कृषि विभाग का मुख्यालय पहाड़ों से मैदान में भेज दिए हैं।
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-मोहन नेगी, पूर्व उपाध्यक्ष छावनी परिषद रानीखेत।
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