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पशु अस्पतालों के बाल बुरे, कैसे बढ़े दूध उत्पादन

Wed, 16 Sep 2015 10:11 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो/अल्मोड़ा।
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 राज्य में पशुपालन को बढ़ावा देने के तमाम दावे किए जाते हैं, लेकिन पशु चिकित्सा व्यवस्था के हाल बुरे हैं। ग्रामीण इलाकों में पशु चिकित्सा की ज्यादातर जिम्मेदारी पशु धन सेवा केंद्रों पर है, लेकिन पशु प्रसार अधिकारियों के 69 पद खाली हैं। पशु चिकित्सक का एक और फार्मेसिस्टों के 22 पद भी लंबे समय से रिक्त हैं। इस कारण पशु चिकित्सा व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो रही है।

जिले में कुल 37 पशु अस्पताल हैं। जिले के दूरस्थ क्षेत्र देघाट में स्थित राजकीय पशु अस्पताल में काफी लंबे समय से डाक्टर का पद खाली है। फार्मेसिस्टों के कुल 37 पदों में से 22 पद खाली हैं। फार्मेसिस्टों की कमी के कारण भी पशु चिकित्सा व्यवस्था पर विपरीत असर पड़ रहा है। पशु अस्पताल धौलछीना, बाड़ेछीना, धौलादेवी, भनोली, कोलदोड़म, बानठौक, लमगड़ा, जैंती, बसौली, द्वाराहाट, बग्वालीपोखर, मजखाली, जाजली, जौरासी, रानीखेत, देघाट, मौलेखाल, मानिला, झीपा, सांकर, भैरनखाल, बासोट में फार्मेसिस्ट नहीं हैं। वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर इन अस्पतालों में दूसरे अस्पतालों से फार्मेसिस्ट भेजे जाते हैं।
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ग्रामीण पशुपालकों को बेहतर सुविधा देने के लिए न्याय पंचायतों में स्थापित पशु सेवा केंद्रों की स्थिति भी बदतर है। इन केंद्रों में पशुधन प्रसार अधिकारियों के 109 स्वीकृत पदों में से 69 पद रिक्त हैं। पशु सेवा केंद्र दन्यां, आरा सल्पड़, खेती, सल्लाभाटकोट, कनारीछीना, अंडोली, बसंतपुर, पुभाऊं, मोतियापाथर, बिनौला, ममरछीना, चनौदा, भैसडग़ांव, मनान, ऐठानी, कफड़ा में लंबे समय से पशुधन प्रसार अधिकारी नहीं हैं। पशु डाक्टरों, फार्मेसिस्टों और पशु धन प्रसार अधिकारियों के अभाव में नस्ल सुधार, कृत्रिम गर्भाधान, पशुओं के टीकाकरण समेत पशु स्वास्थ्य के कार्यक्रम प्रभावित हैं। पशु चिकित्सकों की कमी का खामियाजा पशुपालकों को भुगतना पड़ता है। खासकर दूरस्थ क्षेत्रों के पशुपालकों को काफी परेशानियों से जूझना पड़ रहा है।

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