श्रद्धाभाव के आगे कोई भी अभाव आड़े नहीं आते, यह साबित कर रही हैं यहां अम्याड़ी निवासी भाबरी आमा। मात्र वृद्धावस्था पेंशन के सहारे 82 वर्षीय आमा ने इस बार 12वीं भागवत कथा शुरू करा दी है। आमा बाल विधवा हैं, इस सद्कार्य के लिए उन्होंने अपनी अधिकांश भूमि तक बेच दी है। भागवत कथा को सबसे बड़ा अनुष्ठान माना जाता है। वृद्धावस्था पेंशन के सहारे आठ दिनी इस कथा को कराना मामूली बात नहीं है। वह बताती हैं कि 12 साल की आयु में उनका विवाह हुआ, एक साल बाद पति नंदा बल्लभ का निधन हो गया, तब से वह अकेली हैं। आमा बताती हैं कि बचपन से ही उनके मन में श्रद्धाभाव रहा है। श्रद्धा के आगे कोई भी काम कठिन नहीं होता। वह बताती हैं कि उनके एक रिश्तेदार स्व. हंसादत्त पांडे दिल्ली पुलिस में थे, 28 साल पहले उनके निधन से पहले वह उनसे नियमित रूप से भागवत कथा कराने को कह गए थे, तब से वह नियमित रूप से इस अनुष्ठान को करा रही हैं, हालांकि इस कार्य में कई ग्रामीण भी उनका सहयोग करते हैं। जमीन तो वह बेच चुकी हैं, घास बेचकर भी वह इन अनुष्ठानों को पूरा करा रही हैं, जब तक सांस है तब तक वह इस अनुष्ठान को करती रहेंगी। भावरी आमा के नाम से प्रसिद्ध पना देवी सर्दियों में अपने ननिहाल रामनगर (भाबर) चली जाती हैं, इसीलिए क्षेत्र में वह भाबरी आमा के नाम से प्रसिद्ध हैं। इस आयु में भी आमा काफी कर्मठ महिला हैं। भागवत में तीन गांवों के लोग प्रसाद ग्रहण करने पहुंचते हैं।