अल्मोड़ा। उत्तराखंड समेत पर्वतीय जिलों में लोक वाद्ययंत्रों की जगह अब आधुनिक वाद्ययंत्र लेने लगे हैं। सरल, हल्के और डिजिटल होने के कारण आधुनिक वाद्ययंत्रों को ज्यादा प्रयोग में लाया जाने लगा है। पहले पहाड़ में हर जगह दिखने वाले लोक वाद्ययंत्र रणसिंह, कांसे की थाली, तुरही, डौंर, दमाऊं अब बहुत कम दिखाई देते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में पहले आम तौर पर प्रयोग होने वाली नागफणी, भौंकर आदि लोकवाद्य यंत्र तो विलुप्त सा हो गया है।
लोककला की विविध विधाओं ने ही हमारे जीवन की मर्यादा निर्धारित की है। वर्तमान में लोक संस्कृति हो या फिर लोक वाद्य या लोक कला, ये सभी चीजें अपनी अंतिम सांसे गिन रही हैं। पहाड़ से विलुप्त हो रहे लोकवाद्य यंत्रों के बारे में रंगकर्मी जुगल किशोर पेटशाली बताते हैं कि लोक वाद्य कभी हमारे पहाड़ की जीवन शैली का अंग हुआ करता था। लेकिन धीरे धीरे इन वाद्ययंत्रों का प्रयोग करने वाले कलाकारों का मोह इससे छूटता गया।
इसका प्रमुख कारण वादकों के परिवार में रोजी रोटी का संकट होना था। सरकारों ने लोकविधाओं, लोक कलाकारों, लोक वाद्यों को आगे बढ़ाने, उन्हें संरक्षित करने को प्रयास नहीं किया। नतीजतन कलाकार अपनी विधाओं और कला से दूर होते चले गए। वहीं आधुनिक समय डिजीटलाइजेशन होने के कारण भी लोकवाद्य पर ग्रहण सा लग गया।
मांगलिक कार्यों और मेलों आदि अवसरों पर बजाई जाने वाली नागफणी तांबे और पीतल की तुरही नुमा लोक वाद्य है। तुरही का आगे का हिस्सा खुला और चौड़ा होता है, जबकि नागफणी का आगे का हिस्सा या मुंह नाग या सांप के मुंह की तरह का बना होता है।
इसी के कारण इसे नागफणी कहते हैं। कम प्रचलित होने के कारण भी यह मांगलिक कार्यों पर प्रयोग होती रही है। अल्मोड़ा के बाड़ेछीना गांव निवासी रामनाथ गोस्वामी इस वाद्य को बखूबी बजाया करते थे। वृद्धावस्था के कारण अब वह नागफणी को बहुत कम बजाया करते हैं।
भोंकर तांबे का बना हुआ तुरही की तरह का लोक वाद्य है। इसकी लंबाई चार से पांच फीट तक होती है। ज्यों-ज्यों इसकी लंबाई बढ़ते जाती है आगे की ओर यह और अधिक चौड़ा होते जाता है। भोंकर बजाते समय लोक वादक पहले इसका मुंह जमीन की ओर करके फूंक मारता है।
इसके बाद लोक वादक इसका मुंह झटके से ऊपर की ओर उठाकर जोर से फूंक मारता है। आम जनमानस में इसे भोंपू नाम से भी जाना जाता है। कुमाऊं के प्राचीन मंदिरों में भोंकर आज भी जोड़े में रखे हुए मिलते हैं। जिन्हें सुबह शाम आरती के वक्त बजाया जाता है। यह लोक वाद्य विशेष धार्मिक पूजन और देव पूजन के अवसरों पर प्रयोग में लाया जाता है। गढ़वाल में तो इसे भंकोर नाम से जाना जाता है। वर्तमान में यह लोक वाद्य भी लगभग विलुप्त सा हो गया है।