भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक डॉ. त्रिलोचन महापात्रा ने कहा कि मिट्टी बनने की प्रकिया में ही सैकड़ों साल लग जाते हैं लेकिन नदियां इस बहुमूल्य मिट्टी को बहाकर ले जाती है। पर्वतीय क्षेत्रों में हर साल आपदा, भूस्खलन और पानी के बहाव से तेजी से हो रहा मिट्टी का क्षरण चिंताजक हैं।
मृदा संरक्षण को लेकर विवेकानंद कृषि अनुसंधान के वैज्ञानिकों को प्रभावी प्रयास करने होंगे। उन्होंने कहा कि पहाड़ की खेती को रोजगार परक बनाकर ही पलायन पर अंकुश लग सकता है। काश्तकार संस्थान द्वारा विकसित उन्नतशील और कम पानी में अधिक पैदावार देने वाले बीज अपनाकर कृषि को लाभदायक बना सकते हैं।
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पत्रकारों से वार्ता करते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ. महापात्र ने कहा कि जैव विविधता, पर्यावरण, अधिक पैदावार के लिए मृदा संरक्षण होना जरूरी है। जानकारी के अभाव में मिट्टी का कोई मोल नहीं समझा जाता है लेकिन चट्टानों के टूटने से मिट्टी बनने की प्रक्रिया में सैकड़ों साल लग जाते हैं। दुर्भाग्य से उत्तराखंड में हर साल तेज बारिश से काफी उपजाऊ मिट्टी बह जाने से भूमि रौखड़ हो जाती है। इससे खेती को तो नुकसान होता ही है वन संपदा के नुकसान और जैव विविधता पर भी असर पड़ता है। पहाड़ में नदियां संकरी होने से तीव्र वेग से बहती हैं। इससे काफी भूमि का कटाव होता है। नदियों में छोटे-छोटे बांध और बैराज बना कर नदियों के प्रचंड वेग पर अंकुश लगाया जा सकता है। महानिदेशक ने मृदा संरक्षण के लिए वैज्ञानिकों से प्रभावी योजना तैयार करने को कहा।
पर्वतीय क्षेत्र की खेती को लाभदायक और रोजगार परक बनाए बगैर गांवों से हो रहे पलायन पर अंकुश नहीं लग सकता है। इसके लिए ग्रामीणों को संस्थान द्वारा विकसित किए गए उन्नत शील और कम पानी में अधिक पैदावार देने वाले बीजों को अपनाना होगा। वैज्ञानिक इसके लिए काश्तकारों को जागरूक करें। उन्होंने कहा कि पहाड़ों में बारिश के पानी का संरक्षण करना जरूरी है जिससे पेयजल और सिंचाई के लिए पानी की व्यवस्था हो सके।