बागेश्वर। लोकसभा, विधानसभा, नगर निकाय और अब त्रिस्तरीय पंचायती चुनाव में भी कांग्रेस की हार का सिलसिला जारी रहा। सबसे पुरानी पार्टी को गांव से लेकर राज्य और देश तक के चुनाव में जिस तरह से हार मिल रही है, पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं के लिए यह निराश करने वाला है। वर्तमान में जिले के केवल नगर पंचायत गरुड़ में ही कांग्रेस की अध्यक्ष हैं।
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश में जिस तरह से कांग्रेस लगातार पिछड़ती गई, उसका असर जिले में भी देखने को मिला। 2009 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस के प्रदीप टम्टा लोकसभा सांसद बने थे। 2012 के विधानसभा चुनाव में कपकोट सीट से कांग्रेस के ललित फर्स्वाण ने जीत हासिल की थी। 2014 में हुए पंचायत चुनाव में कांग्रेस के हरीश ऐठानी जिला पंचायत अध्यक्ष बने तो बागेश्वर ब्लॉक प्रमुख पद पर कांग्रेस की रेखा खेतवाल जीतीं। 2013 में हुए निकाय चुनाव में गीता रावल ने नगर पालिका अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की थी। हालांकि बाद में पार्टी लगातार पिछड़ते चली गई।
2014 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस के प्रदीप टम्टा को भाजपा के अजय टम्टा से हार मिली। इसके बाद से कांग्रेस लोकसभा की सीट आज तक नहीं जीत सकी है। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की दोनों विधानसभा सीटों पर हार हुई। यही हाल 2022 के विधानसभा चुनाव में भी देखने के लिए मिला। 2019 में निकाय चुनाव में नगरपालिका सीट भी कांग्रेस के हाथ से चली गई। इस बार भी कांग्रेस इस सीट को नहीं जीत सकी है। 2013 के निकाय चुनाव में कपकोट में कांग्रेस के गोविंद बिष्ट नगर अध्यक्ष बने थे। इस बार के निकाय चुनाव में गरुड़ से कांग्रेस की भावना वर्मा ने कांग्रेस की लाज बचाने का काम किया। बाकी दोनों निकाय भाजपा के पास हैं। अब पंचायत चुनाव में जिस तरह से कांग्रेस को एकतरफा हार मिली है, वह 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकते हैं। अब देखना होगा कि सबसे पुरानी पार्टी लगातार हार के सिलसिले को तोड़ने के लिए क्या कदम उठाएगी।
प्रत्याशी चयन को लेकर उठे सवाल
बागेश्वर। इस पंचायत चुनाव में कांग्रेस की रणनीति को लेकर कई सवाल उठे। पहले पार्टी ने जिला पंचायत के सभी पदों पर प्रत्याशियों की सूची जारी नहीं की। केवल 16 सीट पर ही पार्टी समर्थित प्रत्याशी थे। इनमें से कई प्रत्याशियों की जीत को लेकर लोगों को पहले ही संदेह था। एक सीट पर भाजपा की निर्विरोध जीत को लेकर भी कांग्रेस की रणनीति पर सवाल उठाए गए। जिपं अध्यक्ष और ब्लाॅक प्रमुख के पदों के लिए भी पार्टी की ओर से प्रत्याशियों की सूची जारी नहीं की गई। इसके उलट भाजपा ने हर कदम नापतोल कर रखा।