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जख्मी होने के बाद भी मोर्चे पर डटे रहे थे मेजर शैतान सिंह

Fri, 17 Nov 2017 11:25 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, रानीखेत (अल्मोड़ा)।
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मेजर शैतान सिंह  - फोटो : amar ujala
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कुमाऊं रेजीमेंट केंद्र का इतिहास शौर्य और पराक्रम की मिसाल है। वीरता के लिए जानी जाने वाली 13 कुमाऊं रेजीमेंट ने 1962 में भारत-चीन युद्ध में झंडे गाड़े। मेजर शैतान सिंह इस युद्ध के दौरान चार्ली कंपनी के कमांडर थे।
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यह कंपनी उस वक्त साढ़े 14 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित चुशूल सेक्टर (रेजांग्ला दर्रे) में तैनात थी। मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में अहीर जवानों ने चीनियों से हार नहीं मानी। गोला, बारूद के अभाव के बावजूद वीर जांबाजों ने सैकड़ों चीनी जवानों को मार गिराया। वीरता के लिए मरणोपरांत मेजर शैतान सिंह को परमवीर चक्र से नवाजा गया।

मेजर शैतान सिंह का जन्म एक दिसंबर 1924 को हुआ था। 1962 में चीनी सेना के आक्रमण के बाद रेजांग्ला दर्रे पर मोर्चा ले रही कंपनी के कमांडर मेजर शैतान सिंह थे। मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में जांबाजों ने चीनी आक्रमण का मुंहतोड़ जवाब दिया।
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चीनी सेना ने ताबड़तोड़ हमले किए, लेकिन भारतीय जांबाजों ने इस इलाके को नहीं छोड़ा। रक्षा विशेषज्ञ अवकाश प्राप्त ले. जनरल मोहन चंद्र भंडारी ने बताया कि जब भारतीय सैनिकों के पास गोला-बारूद खत्म हो गया तो जवानों ने ग्रेनेड निकाली और चीनियों पर टूट पड़े।

हालांकि इस युद्ध में 18 नवंबर 1962 को चार्ली कंपनी के 110 जांबाज शहीद हो गए, लेकिन तब तक सैनिक अपना काम कर चुके थे। उन्होंने 600 से अधिक चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था। वीरता के लिए कंपनी कमांडर मेजर शैतान सिंह को वीरता के लिए देश का सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र मिला।

13 कुमाऊं के जितने भी जांबाज शहीद हुए उनकी याद में आज भी चुशूल सेक्टर में बड़ा स्मारक है। ले. जनरल भंडारी ने बताया कि 13 कुमाऊं रेजीमेंट रानीखेत में भी तैनात रही, उन्हीं की याद में यहां रेजांग्ला मैदान का निर्माण भी हुआ।

सुबह के वक्त चोरी से हमला किया था चीनी सेना ने

चीनी सेना ने रेजांग्ला दर्रे पर सुबह के वक्त हमला किया था। चीनी सेना से मुकाबला करते हुए मेजर शैतान सिंह को गोलियां लग गईं, लेकिन उन्होंने इलाज तक नहीं कराया, अपनी पोस्ट पर साथियों के साथ डटे रहे और उनका हौसला बढ़ाते रहे।

घायल अवस्था में भी वह चीनी सैनिकों पर टूट पड़े और शहीद हो गए। दो माह बाद चुशूल सेक्टर में भारी बर्फ में दबे जांबाजों के शव बरामद हुए, जवानों के हाथ बंदूकों की ट्रिगर पर थे तथा कई जवानों ने हथगोले हाथों में पकड़े थे।
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