जिला और नगरपालिका के शोर में पर्यटन नगरी से महत्वपूर्ण विभाग दूसरी जगह शिफ्ट होते चले गए, लेकिन इन्हें रोकने के लिए किसी ने आवाज तक नहीं उठाई। यह कार्यालय इतने गुप्त तरीके से शिफ्ट हुए कि किसी को भनक तक नहीं लग सकी।
इनमें उत्तराखंड पावर कारपोरेशन को विद्युत जनपद निर्माण खंड, भेषज विकास संस्थान, कृषि विज्ञान केंद्र चौबटिया प्रमुख हैं। स्थानीय लोग भी जिला और नगरपालिका के आए दिन आंदोलन करते दिखते हैं, लेकिन इन कार्यालयों को हटाने के विरोध में कोई आवाज तक नहीं उठी।
प्राकृतिक सौंदर्य, शांत वातावरण को देखते अंग्रेजों ने कभी रानीखेत को देश की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का सपना संजोया था, लेकिन आजादी के बाद अपनी ही सरकारों ने पर्यटन नगरी की घोर उपेक्षा की। पर्यटन की दृष्टि से रानीखेत काफी महत्वपूर्ण स्थल हो सकता था, लेकिन इसका पर्यटन विकास तक नहीं कर सके।
स्थानीय लोग आए दिन जिला, नगरपालिका के लिए आंदोलनरत रहते हैं, लेकिन पर्यटन नगरी से कई महत्वपूर्ण विभाग गुपचुप तरीके से अन्यत्र शिफ्ट हो गए, किसी को भनक तक नहीं लगी। गनियाद्योली में भेषज विकास संस्थान था, यहां कभी सचिव स्तर के अधिकारियों को भेषज विकास का प्रशिक्षण दिया जाता था। 2002 में यह संस्थान भी देहरादून शिफ्ट हो गया।
अब वहां पुराने भवन खंडहर हो रहे हैं। इसके बाद 2002-03 में ऊर्जा निगम का विद्युत जनपद निर्माण खंड पर्यटन नगरी से हल्द्वानी चला गया। 2008-09 में यहां चौबटिया स्थित कृषि विज्ञान केंद्र को कोसी मटेला शिफ्ट कर दिया गया। इस केंद्र से स्थानीय कृषकों को वैज्ञानिकों द्वारा खेती किसानी के टिप्स मिल जाते थे। 2011 में जिले का सबसे पहला कोषागार उपकोषागार बन गया।
2006 में चौबटिया उद्यान निदेशालय का शोध केंद्र पंतनगर चलाया गया। हॉर्टीकल्चर टेक्नोलॉजी मिशन, फूड प्रोसेसिंग के निदेशालय अलग बना दिए गए। चौबटिया उद्यान निदेशालय दुर्गति की कगार पर है। निदेशालय में निदेशक तक नियमित नहीं बैठते। निदेशालय को भी देहरादून शिफ्ट करने की चर्चाएं रहती हैं। 2002-03 में चिलियानौला में स्थापित सर्वे ऑफ इंडिया का कार्यालय देहरादून शिफ्ट कर दिया गया।
राज्य बनने के बाद पर्यटन नगरी की अधिक उपेक्षा हुई। माल रोड स्थित एसएसबी का डिवीजन मुख्यालय लखनऊ चला गया, सेना की ब्वाइज कंपनी मऊ शिफ्ट हो गई। इस कंपनी के माध्यम से युवाओं को सेना में जाने के अवसर मिलते थे। मुख्य संस्थानों के स्थानांतरण होने से जनप्रतिनिधियों की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठने भी लाजमी हैं।