कुमाऊं मंडल का एकमात्र भातखंडे हिंदुस्तानी संगीत महाविद्यालय अलग राज्य बनने के बाद भी उपेक्षित है। प्रदेश सरकार की उपेक्षा के चलते यह संस्थान अपेक्षाओं में खरा नहीं उतर रहा है।
संस्थान में प्रधानाचार्य समेत प्रवक्ताओं के 14 पद सृजित हैं, लेकिन पांच पदों पर ही नियमित प्रवक्ता हैं। नियमित प्रवक्ता नहीं होने से छात्र-छात्राओं को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है।
भारतीय शास्त्रीय संगीत की विधा को जीवंत रखने के लिए अल्मोड़ा में 1989 में भातखंडे संगीत महाविद्यालय की स्थापना की गई थी। जिला पंचायत के किराए के भवन में महाविद्यालय शुरू हुआ। यहां शास्त्रीय गायन, सितार, कथक नृत्य, भरतनाट्यम विषय शुरू हुए।
महाविद्यालय की स्थापना होने से छात्र-छात्राओं को शास्त्रीय संगीत की विभिन्न विधाओं को सीखने का मौका मिला। उत्तर प्रदेश के शासनकाल में महाविद्यालय में प्रवक्ताओं के सभी पद भरे हुए थे।
पृथक राज्य बनने के बाद पूर्व में तैनात 13 प्रवक्ता उप्र संवर्ग के थे और पृथक राज्य निर्माण के बाद अपने मूल प्रदेश लौट गए। राज्य बनने के बाद संस्थान की स्थिति खराब होते गई और कभी भी पूरे पद भरे नहीं रहे।
वर्तमान में संस्थान में 180 छात्र-छात्राएं अध्ययनरत हैं। प्राचार्य के अलावा प्रवक्ता गायन, कनिष्ठ प्रवक्ता सितार, कनिष्ठ प्रवक्ता भरतनाट्यम, संगतकर्ता तबला ही नियमित हैं। संगकर्ता सारंगी का पद छह माह से अधिक समय से खाली है।
कनिष्ठ प्रवक्ता गायन, संगतकर्ता गायन भारतनाट्यम के पद पर भी नियुक्ति नहीं हुई है। जबकि प्रवक्ता सितार, प्रवक्ता कथक नृत्य, संगतकर्ता तबला, संगतकर्ता गायन कथक के पद पर संविदा कार्मिक तैनात हैं।
राज्य बनने के बाद सरकार और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता से कुमाऊं मंडल का यह एकमात्र संस्थान उपेक्षा का शिकार है। इधर संस्थान के प्राचार्य योगेश पंत ने बताया कि रिक्त पदों पर शासन स्तर से ही नियुक्ति होती है। इसकी सूचना शासन को भेजी गई है।