अल्मोड़ा। जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान (जीबीपी-एनआईएचई) कोसी में भारतीय हिमालय क्षेत्र–2047: पर्यावरण संरक्षण एवं सतत सामाजिक-आर्थिक विकास विषय पर आयोजित तीन दिनी हिमालयन कॉन्क्लेव संपन्न हुई। पर्यावरणीय सततता, प्रदूषण और कचरा प्रबंधन सत्र में प्रो. एस राम चंद्रन ने हिमालय में जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण के उभरते परिदृश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि एरोसोल हिमालयी जलवायु को गर्म कर रहे हैं। इसके दीर्घकालिक आंकड़ों की निगरानी आवश्यक है।
मुख्य अतिथि मेयर अजय वर्मा ने हिमालय संरक्षण के प्रति जन–जागरुकता और सामूहिक जिम्मेदारी को रेखांकित किया। डॉ. जेसी कुनियाल ने हिमालयी नगरपालिकाओं के लिए माइक्रो बायो कंपोस्टिंग आधारित वेस्ट टू एनर्जी मॉडल प्रस्तुत किया। डॉ. रक्षक कुमार ने माइक्रोबियल तकनीकों और ग्लेशियल बैक्टीरिया के माध्यम से जैव उपचारण और जैविक कचरा प्रबंधन की संभावनाएं बताईं। जैव विविधता संरक्षण और प्रबंधन में डॉ. एसएस सामंत ने नवाचार नीति समुदाय के बीच अंतर को पाटने की आवश्यकता बताई।
प्रो. ए खुरु ने चेतावनी दी कि पर्यटन दबाव के कारण हिमालय उच्चभूमि हॉटस्पॉट से डार्कस्पॉ की ओर बढ़ रहे हैं। प्रकृति आधारित समाधान आवश्यक हैं। डॉ. देवेंद्र सिंह ने हिमालय की समृद्ध ब्रायो–विविधता और पर्यावरणीय प्रभाव आंकलनों में ब्रायोफाइट्स को शामिल करने पर बल दिया। नवीन जुयाल ने बताया कि उच्च हिमालय में तापमान वृद्धि से हिमनद तंत्र अस्थिर हो रहा है। वेटलैंड और पीटलैंड प्रबंधन सत्र में डॉ. अरुण ज्योति नाथ ने रैमसर स्थलों में प्रबंधन योजनाओं की कमी और बढ़ते प्रदूषण, अतिक्रमण पर चिंता जताई। इस मौके पर अपूर्वा ठाकुर, डॉ. राजन कोट्रू, संस्थान के निदेशक डॉ. आईडी. भट्ट और भारत सरकार के पूर्व सचिव हेम पांडे ने भी विचार रखे। डॉ. के चंद्रशेखर ने सभी का आभार जताया।