अल्मोड़ा। वन पंचायत सरपंच संगठन की अल्मोड़ा के एक होटल में हुई बैठक में वक्ताओं ने पंचायती वनों के विकास के लिए उन्हें वन विभाग के नियंत्रण से मुक्त करने की मांग की। उन्होंने कहा कि देश में वर्तमान में लागू वन अधिनियम के 1927 में अस्तित्व में आ जाने के बाद 1931 में बनी पहली वन पंचायत नियमावली को जन भावना को देखते हुए अंग्रेजों द्वारा वन अधिनियम के तहत नहीं बनाया गया था। आजादी के बाद वन पंचायत नियमावली का निर्माण वन अधिनियम 1927 के अंतर्गत कर वन पंचायत की अवधारणा को ही समाप्त कर दिया गया है।
उन्होंने कहा कि वन पंचायत की भूमिका बिना पैसे के चौकीदार सी हो गई है। उन्होंने कहा कि जेएफएम, कैंपा, जायका जैसी परियोजनाओं ने वन पंचायतों में जन आधारित वन प्रबंधन की सदियों पुरानी व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया है। योजना क्रियान्वयन में वन पंचायतों से भारी कमिशन लिया जा रहा है। चीड़ वनों का लगातार विस्तार हो रहा है, जल स्रोत सूख रहे हैं, दावानल की घटनाएं हर साल बढ़ रही हैं, लेकिन फायर वाचरों की नियुक्ति में वन विभाग द्वारा वन पंचायतों को विश्वास में नहीं लिया जा रहा है। बंदर, लंगूर, सुअर और तेंदुओं का आतंक दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। इनसे निजात दिलाने के लिए शासन, प्रशासन के दावे खोखले साबित हो रहे हैं।
बैठक में तय किया गया कि इन मुद्दों पर सरपंच संगठन मुहिम चलाएगा। 13 नवंबर को सरकार को ज्ञापन भेजेेंगे। बैठक में सरपंच संगठन बागेश्वर के अध्यक्ष पूरन सिंह रावल, सरपंच संगठन धारी नैनीताल के अध्यक्ष हरेंद्र सिंह बिष्ट, सरपंच संगठन ताकुला के अध्यक्ष डुंगर सिंह, सचिव दिनेश लोहनी, ईश्वर जोशी, शीबा सेन, दीवान नगरकोटी, सरपंच दिनेश पांडे, गिरीश उप्रेती, गंगा सिंह, कुंदन सिंह, प्रताप सिंहम, सुंदर सिंह, नवीन राम, बहादुर मेहता आदि मौजूद थे।