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गूगल के युग में किताबों से प्रेम कम नहीं हुआ है युवाओं का

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अल्मोड़ा। किसी ने सही कहा है कि किताबें वास्तव में बातें करती हैं। किताबों में चिड़िया भी चहचहाती हैं, किताबें गीत भी गाती हैं। किताबों में दुनिया की सैर भी की जाती है। इन्हीं ज्ञानवर्धक किताबों को पढ़कर समाज शिक्षित भी बनता है। कंप्यूटर, गूगल के इस दौर में जहां लोग किताबों से दूर होते जा रहे हैं, वहीं अल्मोड़ा के पुस्तकालय में रोजाना तमाम युवाओं को देखकर पुस्तक प्रेमियों को जरूर सुकून मिलेगा। कोलाहल से दूर जीआईसी के पास स्थित यह पुस्तकालय जाड़ों की छुट्टियों में गुलजार हुआ है। यहां हर रोज आने वाले युवाओं में अधिकांश शोधार्थी, स्कूल, कॉलेज के छात्र हैं।
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संचार क्रांति के दौर में अब युवा इंटरनेट के जरिए देश-दुनिया, इतिहास की जानकारी ले रहे हैं। इससे पिछले कुछ वर्षों में लोगों की किताबों में रुचि काफी कम हुई है। इसी दौड़ में अल्मोड़ा के पुस्तकालय में युवा वर्ग का किताबों के प्रति लगाव दिख रहा है।
1960 में शहर के बीचों बीच स्थापित जिला पुस्तकालय में स्वाधीनता आंदोलन से पहले और बाद की करीब 40 हजार से अधिक किताबें शोभा बढ़ा रही हैं। सुबह दस से पांच बजे तक यहां हर रोज करीब 60 से 70 युवा ज्ञानवर्धक किताबें पढ़ने पहुंच रहे हैं, जिनमें अधिकतर शोधार्थी, मेधावी, कॉलेज के छात्र-छात्राएं हैं। शुक्रवार सुबह यहां 23 युवा पहुंच चुके थे। उनके हाथ में भारतीय अर्थव्यवस्था, हिमालयन गजेटियर, भारतीय रक्षा अकादमी, भूगोल, भारत विश्व का इतिहास के अलावा प्राचीन राज व्यवस्था, करेंट अफेयर्स, यूसैट, टैट, यूपीएससी और लोक प्रशासन की किताबें थीं। पुस्तकालय में सुमित्रानंदन पंत, मुंशी प्रेमचंद्र, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, राहुल सांकृत्यायन, हरि शंकर परसाई, हरिवंशराय बच्चन, महादेवी वर्मा, फणीश्वर नाथ रेणू, जय शंकर प्रसाद, धर्मवीर भारती, हजारी प्रसाद द्विवेदी, मोहन राकेश जैसे दिग्गज साहित्यकारों की पुस्तकें हैं। पुस्तकालय प्रभारी महेंद्र सिंह भोज ने बताया कि शोध छात्रों के अलावा बड़ी संख्या में प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होने वाले विद्यार्थी यहां किताबें पढ़ने पहुंच रहे हैं। रोजाना करीब 60 से 70 लोग यहां पढ़ने आते हैं, जिनमें अधिकतर युवा करेंट अफेयर्स के अलावा इतिहास, अर्थव्यवस्था, गजेटियर पुस्तकों की मांग करते हैं।
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