अल्मोड़ा। होली के दिन जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं पहाड़ की महिलाओं में भी उत्साह बढ़ता जा रहा है। पहाड़ की महिलाओं की होली में हंसी, ठिठोली, मतवालापन, सौंदर्य सब कुछ दिखाई देता है। आज भी शहरों के अलावा गांव की महिलाएं होली के दौरान घर का काम निपटाकर दोपहर को निकल जाती हैं और एक दिन में छह से सात होली बैठकें निपटाकर शाम को घर लौटती हैं।
यह बंसत ऋतु के यौवन की मिठास ही है जहां पुरुष और महिलाएं होली में बढ़चढ़कर हिस्सा लेती हैं।
यह सत्य है कि किसी भी त्योहार का उल्लास महिलाओं के बिना अधूरा ही रहता है। त्योहारों को संरक्षित भी अगर किसी ने किया है तो वह महिलाएं ही हैं।
पुरुषों की बैठकी होली, खड़ी होली और महिलाओं की होली के कई गीत दोनों ही महफिलों में गाए जाते हैं। आओ-आओ ऋतुराज खेलो होली..., होली खेलें पशुपतिनाथ नगर नेपाला..., होली खेलूंगी मैं श्याम से डट के..., होली आई रे रसिया के अलावा काहे करत तकरार, गरबा लगा ले, रह गए अब तो सावन के दिन चार.. कुछ ऐसे गीत हैं जिन्हें महिलाएं होली की हर महफिल में बड़े उल्लास से गाती हैं।
महिला समाज एकादशी से होली के टीके तक घर-घर में होली बैठकों का आयोजन करती आई हैं और होली गीतों के साथ ही स्वांग (व्यंग)का भी उत्कृष्ट प्रदर्शन करती हैं। समाजशास्त्री प्रो. इला साह का मानना है कि कुमाऊंनी महिलाएं संस्कृति के मामले में काफी सशक्त और समृद्ध हैं। पुरुषों के वर्चस्व वाले त्योहार होली को महिलाओं ने ने ही बचा के रखा है।
वहीं प्रसिद्ध लोक गायिका और कलाकार लता पांडे का कहना है कि आज भी महिलाओं के होली उत्साह में कोई कमी नहीं आई है। होली बैठकों की जानकारी मिलते ही महिलाएं घर से निकल जाती हैं और कई घरों में एक साथ होली गीत गाते हुए शाम को घर लौटती हैं। यह एक अच्छी संस्कृति है कि हम अपने त्योहारों को लेकर काफी संजीदा हैं। गणेश, शिव, कृष्ण की महिमाओं से शुरू होती महिलाओं की प्रचलित खास होलियों में मेरी नथ गढ़ि दे छैला सुनारा.., तू करिले अपनो ब्याह देवर..., रंग में होली कैसे खेलुंगी मैं सावरिया के संग.., आज बिरज में होली रे रसिया.., मेरे रंग से रंगे दोनों हाथ सखी री.., सिर धरै मटकिया डोले रे.., मेरो रंगीलो देवर घर ऐ रौ छ...आदि होलियां खासी प्रचलन में हैं। इसके अलावा अन्य आंचलों में भी महिलाओं द्वारा काफी रंगीली होलियां गाई जाती हैं।