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वैटलैंड पर विचार मंथन करने जुटे पांच हिमालयी राज्यों के वैज्ञानिक

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अल्मोड़ा। भारतीय उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्थित झीलों और अन्य जल खंडों के संरक्षण और प्रबंधन विषय पर जीबी पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान में आयोजित विचार मंथन कार्यशाला में हिमालयी क्षेत्रों के पांच प्रदेशों से आए विषय विशेषज्ञों ने कहा कि वैटलैंड (नम भूमि) के नष्ट होने की रफ्तार दिनों दिन बढ़ती जा रही है। ऐसे में वैडलैंड के संरक्षण की नीति को प्रभावी रूप से लागू करने की आवश्यकता है।
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कार्यशाला में बतौर मुख्य अतिथि पर्यावरण मंत्रालय में संयुक्त सचिव मंजू पांडे ने कहा कि वैटलैंड के संरक्षण के लिए दीर्घकालिक नीति बनाने की आवश्यकता है। वैटलैंड इंटरनेशनल साउथ एशिया के निदेशक डॉ. रितेश कुमार ने कहा कि 2017 के वैटलैंड नियम किसी भी पारिस्थितिकी विशेष की उपयोगिता को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं।

भारत सरकार के पूर्व सलाहकार ललित कपूर ने कहा कि वैटलैंड पर जलवायु परिवर्तन के संवेदनशील प्रभाव देखने को मिल रहे हैं। वर्तमान समय में इन उच्च हिमालयी झीलों को पर्यटन दृष्टि से अत्यधिक उपयोग में लाया जा सकता है। जिसके दुष्परिणाम ज्यादा देखने को मिल रहे हैं।
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जीबी पंत पर्यावरण संस्थान के निदेशक डॉ. आरएस रावल ने कहा कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में तालाबों का जलवायु परिवर्तन के मद्देनजर काफी महत्व है। संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. सुब्रत शर्मा ने उच्च हिमालयी तालाबों के बारे में बताया कि पूरे हिमालयी क्षेत्रों में 4700 तालाब हैं और भी इन जलाशयों के वर्गीकरण के बारे में एक स्पष्ट राय नहीं है।

यूकोस्ट के महानिदेशक डॉ. राजेंद्र डोभाल ने कहा कि वैटलैंड के संरक्षण के लिए निर्धारित नियमों का अनुपालन करने की आवश्यकता है। कार्यक्रम में उत्तराखंड के अपर प्रमुख वन संरक्षक डॉ. कपिल जोशी, गढ़वाल विवि के प्रो. रमेश शर्मा, डीएफओ केएस बिष्ट, डब्लूडब्लूएफ के अमित दूबे, पंकज चंन्द्रन, आरती गुप्ता, बीएसआई सिक्किम के राजीव गोगोई, जीसी कन्हाल, विक्रमजीत सिन्हा, डॉ. संतोष कुमार, डीजी श्रेष्ठ, एमपी थापा, अरुणाचल से भूपेंद्र मलिक, पंकज भराली, यूएनडीपी के अभिषेक गोसाल, एनआईएच के डॉ. पीजी जोस, रवि शर्मा, एमके सेठ समेत संस्थान के वैज्ञानिक, शोधार्थी आदि मौजूद रहे। संचालन संस्थान की वैज्ञानिक डॉ. बसुधा अग्निहोत्री ने किया।
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