अल्मोड़ा। महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम सिंह धौनी का स्वतंत्रता संग्राम में अहम योगदान रहा है। उनमें देश भक्ति कूट-कूट कर भरी हुई थी। स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उनके घर वाले चाहते थे कि वह कोई सरकारी नौकरी कर लें, लेकिन देश की सेवा करने का व्रत ले चुके राम सिंह धौनी ने तहसीलदार की सरकारी नौकरी के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। इसके बाद उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों का भ्रमण कर लोगों में आजादी की अलख जगाई।
क्रांतिकारी राम सिंह धौनी का जन्म 24 फरवरी 1893 में अल्मोड़ा जिले के तल्ला बिनौला गांव में कुंती देवी और हिम्मत सिंह धौनी के घर में हुआ था। वह बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। उन्होंने गांव के प्राथमिक विद्यालय से लेकर क्रिश्चियन कालेज इलाहाबाद में बीए तक की पढ़ाई प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की।
बताया जाता है कि तब धौनी सालम क्षेत्र से स्नातक उत्तीर्ण करने वाले पहले व्यक्ति थे। धौनी सादा जीवन और उच्च विचार के सिद्धांत पर चलते थे। खादी की धोती, कुर्ता और गांधी टोपी उनका पहनावा था। एक बार अल्मोड़ा में धौनी को महामना मदन मोहन मालवीय, काका कालेलकर जैसे देश प्रेमी लोगों के विचार सुनने को मिले।
इसके बाद तो उनकी देश प्रेम की भावना और प्रबल हो गई। 1919 में धौनी बीए अंतिम वर्ष की परीक्षाओं की तैयारियों में जुटे थे। इसी दौरान उनकी माता का निधन हो गया। बीए की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वह सालम लौट आए। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उनके परिजन चाहते थे कि वह कोई सरकारी नौकरी कर लें, लेकिन उन्होंने देश सेवा करने का व्रत ले रखा था। उन्होंने कुमाऊं कमिश्नर के तहसीलदार की सरकारी नौकरी के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था।
राजस्थान प्रवास के दौरान उन्होंने बीकानेर राज्य के सूरतगढ़ मिडिल स्कूल में हेड मास्टर की नौकरी की। शिक्षक की नौकरी करने के पीछे उनका उद्देश्य बच्चों में देश प्रेम की भावना जागृत करना था। 1921 में इस नौकरी से त्याग पत्र देकर रामचंद्र नेवटिया हाइस्कूल फतेहपुर (जयपुर) में सहायक शिक्षक बन गए। धौनी अल्मोड़ा डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के सदस्य के साथ ही 1926 में चेयरमैन भी रहे।
धौनी जब डिस्ट्रक्ट बोर्ड सदस्य थे, उसी दौरान बिट्रिश सरकार ने खादी पर रोक लगा दी थी, लेकिन उन्होंने बोर्ड में प्रस्ताव पास कराकर बोर्ड के सभी कर्मचारियों और शिक्षकों के लिए खादी वस्त्र पहनना अनिवार्य कर दिया। 1928 में वह सालम आ गए और चौखुरी में मिडिल स्कूल की स्थापना की। लोगों में आजादी और शिक्षा के प्रति अलख जगाई।
मुंबई प्रवास के दौरान 1929 में वह चेचक रोगियों की सेवा में जुट गए। इसी दौरान वह इस बीमारी की चपेट में आ गए और उनका स्वास्थ्य लगातार खराब होता गया। 12 नवंबर 1930 को उनका निधन हो गया।