पहाड़ की लाइफ लाइन 108 एंबुलेंस की सेवाएं पटरी से उतरने लगी हैं। वेतन नहीं मिलने से जहां कर्मचारी आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं, वहीं बजट और कर्मचारियों के अभाव में कई बार एंबुलेंस लंबे समय तक खड़ी रह जाती है। कर्मचारियों को पिछले एक साल से वाहन मेंटिनेंस, टीए, डीए आदि बिलों का भी भुगतान नहीं हुआ है। प्रदेश में 650 कर्मचारी एंबुलेंस सेवा में कार्यरत हैं, लेकिन अव्यवस्था के खिलाफ कर्मचारी खुलकर बोलने को तैयार नहीं हैं, पूर्व में हड़ताल करने पर 21 कर्मचारियों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा था।
108 एंबुलेंस सेवा पहाड़ की लाइफ लाइन मानी जाती है। दुर्घटना या गंभीर रोगी को ले जाने के लिए तत्काल मौके पर पहुंचकर कर्मचारी रोगियों को अस्पताल पहुंचाने में अहम भूमिका निभाते हैं, लेकिन तमाम अव्यवस्थाओं के चलते यह सेवा धीरे-धीरे पटरी से उतरती जा रही है। कर्मचारियों का कहना है कि पूर्व में एक 108 वाहन के लिए चार फार्मासिस्ट और चार चालक निर्धारित थे, लेकिन वर्तमान में इनकी संख्या घटाकर दो फार्मासिस्ट और दो चालक कर दी गई है।
जो भी कर्मचारी दिन रात सेवाएं दे रहे हैं उनको मई से वेतन नहीं मिला है, जिसके चलते उनके परिवार के सम्मुख आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। रोजमर्रा की जरूरतों के लाले पड़ रहे हैं। यही नहीं नवंबर 16 से कर्मचारियों को ना तो वाहन मेंटिनेंस भत्ता मिला है और ना ही टीए, डीए आदि बिलों का भुगतान हुआ है। कर्मचारियों की कमी के चलते सेवा भी प्रभावित हो रही है। बजट के अभाव में तेल नहीं मिलने पर कई बार एंबुलेंस लंबे समय से खड़ी रह जाती है।
बताया गया कि सेवा को जीवीके कंपनी संचालित करती है, राज्य सरकार द्वारा वेतन का भुगतान पहले कंपनी को किया जाता है, उसके बाद कंपनी कर्मचारियों को मेहनताना देेती है। उधर पूर्व विधायक पुष्पेश त्रिपाठी का कहना है कि 108 सेवा से पहाड़ के लोगों को अच्छी सुविधा मिल रही है। इसके कर्मचारियों ने हजारों लोगों की जान बचाई है, इनकी समस्याओं का समाधान होना जरूरी है।