वनों की आग को रोकने के लिए शासन से वन विभाग को इस साल अब तक कोई बजट ही नहीं मिला है। हालांकि इस बार अप्रैल और मई में बारिश होते रहने से आग की बड़ी घटनाएं नहीं हुईं लेकिन, इसके बावजूद इस साल अब तक अल्मोड़ा वन प्रभाग और सिविल सोयम वन प्रभाग के अधीन 48.30 हेक्टेयर वन क्षेत्र आग की भेंट चढ़ चुका हैं। जबकि वन पंचायतों में करीब 45 हेक्टेयर क्षेत्र जंगल आग से नष्ट हुआ है।
फायर सीजन में अब तक अल्मोड़ा वन प्रभाग में वनाग्नि की आठ घटनाएं दर्ज हैं। इनमें से छह घटनाएं आरक्षित वन और दो घटनाएं सिविल वन में हुई हैं। इन आठ घटनाओं में रिजर्व वन में 10.50 और सिविल में 2.50 हेक्टेयर क्षेत्र में आग लगी। सिविल सोयम वन प्रभाग के आरक्षित और सिविल वनों में वनाग्नि की छह-छह घटनाएं हुई। इन 12 घटनाओं में आरक्षित क्षेत्र में 17.80 और सिविल वन क्षेत्र में 17.50 हेक्टेयर क्षेत्र आग से जलकर नष्ट हो गया। पता चला है कि जिले की वन पंचायतों में इस साल आग की करीब दो दर्जन घटनाओं में लगभग 45 हेक्टेयर क्षेत्र आग जंगल आग की भेंट चढ़ गया। आग से इन इलाकों में हरे पेड़ जलने के अलावा जीव जंतु भी नष्ट हो गए।
50 क्रू-स्टेशन बनाए हैं वन विभाग ने
आग की घटनाओं पर अंकुश के लिए वन विभाग ने फायर सीजन में दोनों वन प्रभागों में एक मास्टर और 50 क्रू-स्टेशन स्थापित किए हैं। जिला मुख्यालय में मास्टर क्रू-स्टेशन स्थापित है। अल्मोड़ा वन प्रभाग में अलग-अलग स्थानों पर 31 और सिविल सोयम प्रभाग में 29 क्रू-स्टेशन बनाए गए हैं। हर क्रू-स्टेशन में उपलब्ध विभागीय कर्मियों के अलावा चार-चार सीजनल फायर वाचर तैनात कर रखे हैं। सीजनल फायर वाचरों के पारिश्रमिक भुगतान, आग बुझाने के उपकरण आदि के लिए शासन से वन विभाग को अब तक बजट भी नहीं मिला है।
राम भरोसे हैं वन पंचायतें
सिविल और आरक्षित वनों को आग से बचाने के लिए फायर सीजन में वन विभाग अस्थायी श्रमिक तैनात करता है लेकिन, वन पंचायतों में वनाग्नि रोकने की कोई व्यवस्था नहीं है। आग की घटनाएं रोकने के लिए वन पंचायतों को अलग से बजट नहीं मिलता है। वन पंचायतें ग्रामीणों के सहयोग से ही वनाग्नि पर अंकुश लगाने का प्रयास करते हैं। हालांकि आग की बड़ी घटना होने पर संबंधित क्षेत्र में वन विभाग के लोग भी सहायता के लिए पहुंचते हैं।