रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी की वादियों में भटके हजारों लोग जिंदगी की राह तलाश रहे हैं। इनकी गिनती किसी को पता नहीं है। लेकिन मौत की घाटियों से जिन्हें बचा लिया गया है, वे बताते हैं कि दुर्गम स्थानों पर फंसे ऐसे बेबस लोगों की संख्या हजारों में है। भूख लगती है तो घास और मिट्टी खाते हैं।
रोंगटे खड़ी करने वाली आप-बीती
दून अस्पताल में भर्ती हर्रावाला निवासी टैक्सी ड्राइवर मनोहरलाल मौर्य की आप-बीती रोंगटे खड़ी करने वाली है। जिस दिन तबाही आई वे सोनप्रयाग और गौरीकुंड के बीच में थे।
गोरखपुर के पांडेयजी के परिवार को केदारनाथ दर्शन कराने गए थे। पांडेय जी का पूरा नाम नहीं जानते, बातचीत के लिए यह नाम मोबाइल में फीड कर लिया था।
बताते हैं कि पार्किंग में थे कि शाम छह बजे पांडेय जी का फोन आया। ‘अब संपर्क नहीं होगा। सब कुछ खत्म हो गया, सिर्फ मंदिर बचा है।’ और फिर बाढ़, तूफान, भूस्खलन। चारों तरफ बरबादी। जान-बचाने के लिए लोग जिधर रास्ता पाए भागे। बड़ी संख्या में लोग घाटी के दुर्गम स्थानों पर पहुंच गए।
घास को पकड़े घिसटते हुए हजारों लोग बाहर निकलने की राह ढूंढ रहे हैं। बहुत भूख लगने पर घास और मिट्टी खा लेते हैं। उन पर किसी की निगाह नहीं पड़ रही है।
ट्रक पानी में बह गया
मनोहर बताते हैं कि हमारे सामने सेना का खाने से लदा ट्रक पानी में बह गया। दुर्गम पहाड़ी रास्ते से होते हुए वे किसी तरह निकल पाए। जौलीग्रांट एयरपोर्ट बचाकर लाए गए राजेश और मुकेश कहते हैं कि कठमुंडिया से सोन प्रयाग पावर हाउस तक पैदल आए। हर रास्ते पर लाशों का ढेर लगा था।
दो-तीन लोग साथ में बचते-बचाते आ गए। लेकिन दूसरे प्रांतों के बहुत से लोग जान-बचाने के लिए पहाड़ी इलाकों में खो गए हैं। उन्हें रास्ता नहीं मिल रहा है।