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विषम परिस्थितियों को रोना नहीं, जिद और जोश से पाया मुकाम

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वाराणसी। शहर की प्रतिभाएं सफलता के आसमान पर सितारे बनकर चमक रहीं हैं। ज्ञान, सामाजिक कार्य से लेकर खेल के मैदान पर काशी के युवा अपनी काबिलियत का लोहा मनवा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र में बालिकाओं के समानता के अधिकार को लेकर विशाखा ने देश का प्रतिनिधित्व किया तो बास्केटबॉल में दिव्या ने रानी लक्ष्मीबाई ब्रेवरी अवॉर्ड से शहर का नाम रोशन कर चुकीं हैं। सामाजिक कार्यकर्ता नेहा सिंह दो विश्व रिकॉर्ड बनाने के साथ बच्चों और वृद्धाश्रम की माताओं के जीवन में खुशियों के पल भर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस पर हम इन्हीं युवाओं से रूबरू होंगे जिन्होंने शहर को अपनी चमक से बुलंदी पर पहुंचाया है। 12 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय दिवस पर हमने काशी के ऐसे ही चिरागों से बात की जिन्होंने विषम परिस्थितियों में अपनी जिद, जोश और काबिलियत से मुकाम पाया और अपना हुनर का लोहा मनवाया।
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संघर्षों को पार कर संयुक्त राष्ट्र में बढ़ाया देश का मान
पांडेपुर के दौलतपुर निवासी विशाखा ने मुफलिसी में भी अपने सपनों का पीछा करना नहीं छोड़ा। विजय व सरिता अग्रवाल की बेटी विशाखा ने जब जन्म लिया तो परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। डब्ल्यूएच स्मिथ स्कूल से कक्षा दसवीं में 95 फीसदी अंकों से परीक्षा टॉप करने के बाद विशाखा ने 12वीं में भी 90 फीसदी से ज्यादा अंक प्राप्त किया। दसवीं के बाद वो इंजीनियरिंग की तैयारी अच्छी कोचिंग से करना चाहती थी, लेकिन माता-पिता उनकी इस इच्छा को पूरा न कर पाए। इस बात से विशाखा निराश नहीं हुई बल्कि उन्होंने ठान लिया कि 11वीं व 12वीं की पढ़ाई के साथ ही इंजीनियरिंग की तैयारी करेंगी। नतीजतन आईआईटी क्रैक कर वह बेंगलुरु के दयानंद इंजीनियरिंग कॉलेज से बीटेक कर रही हैं। विशाखा ने हालही में अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर अमेरिका के न्यूयार्क में आयोजित कार्यक्रम में लड़कियों के समानता के अधिकार पर देश का प्रतिनिधित्व किया। संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय में 6 लड़कियों ने यूएन वूमेन की कार्यकारी निदेशक के समक्ष गर्ल्स विल राइट प्रस्तुत किया। जिसमें विशाखा ने भारत का प्रतिनिधित्व किया था। इसके साथ ही विशाखा मैथ मैराथन में रामानुजन अवार्ड भी जीत चुकी है।
पिता चाहते थे पढ़ाई, बेटी ने चुना खेल
भारतीय महिला राष्ट्रीय बास्केटबॉल टीम की पूर्व कप्तान दिव्या सिंह जिस परिवार से आती हैं वहां लड़कियों का खेलना अच्छा नहीं माना जाता था। लेकिन दिव्या ने खुद के लिए बास्केटबॉल चुना। हालांकि दिव्या के पिता गौरीशंकर चाहते थे बेटी पढ़ाई करे। लेकिन मां उर्मिला ने बेटी के जुनून को समझा और उन्हें खेल के लिए प्रोत्साहित किया। जब दिव्या ग्राउंड में अभ्यास करने जाती थी तो लोग उनको देखकर तंज कसते थे। लेकिन उन्होंने इसकी परवाह नहीं की। 14 साल की उम्र में दिव्या ने जिला जूनियर टीम से खेल करियर की शुरुआत की। दिव्या को 2 साल बाद उत्तरप्रदेश की टीम का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। 2000 में भारतीय राष्ट्रीय टीम में चयन हुआ। उनके अंतरराष्ट्रीय करियर के मुख्य आकर्षण में 2005 में 20वीं एशियाई बास्केटबॉल परिसंघ चैंपियनशिप में रजत, 2006 में थाईलैंड में प्रथम फुकेट अंतरराष्ट्रीय आमंत्रण बास्केटबाल चैंपियनशिप में स्वर्ण, मेलबर्न में 2006 राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय टीम के कप्तान के रूप में भूमिका निभाई। दिव्या स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया में बतौर कोच काम कर रहीं हैं। दिव्या को भारत गौरव अवॉर्ड फॉर एक्सीलेंस इन स्पोर्ट्स के साथ प्रदेश सरकार की ओर से रानी लक्ष्मीबाई वीरता अवार्ड से सम्मानित भी किया जा चुका है।
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लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाना नेहा का मकसद
वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ इंडिया और यूरेशिया वर्ल्ड रिकॉर्ड जैसे दो अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड बना चुकी बीएचयू की छात्रा नेहा सिंह को गरीब बच्चों और असहायों की मदद करना अच्छा लगता है। इसके लिए नेहा अपनी पेंटिंग बेचकर इनकी मदद करती हैं। मूल रूप से बलिया निवासी नेहा भदैनी स्थित मदर टेरेसा आश्रम में हमेशा जाकर वहां रहने वाली वृद्ध माताओं की सेवा तो करती ही हैं। साथ ही जरूरतमंद बच्चों को शिक्षण सामग्री प्रदान कर उनकी शिक्षा में मदद भी करती हैं। नेहा ने चित्रकलाओं से दशोपनिषद एवं महावाक्यों का पहला डिजिटल एलबम भी तैयार किया है। काशी की इस बेटी को भारत गौरव सम्मान भी मिल चुका है।
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