Varanasi News: वाराणसी जिले में नई तरह की मानसिक बीमारी से युवा ग्रसित हो रहे हैं। छोटी बीमारी को लेकर डॉक्टर से सलाह नहीं ले रहे बल्कि ऑनलाइन इलाज की जानकारी लेकर अपनी बेचैनी बढ़ा रहे हैं।
काशी में युवा एक नई तरह की बेचैनी भरी मानसिक बीमारी से घिरते जा रहे हैं। उनकी इस बेचैनी का कारण मोबाइल, इंटरनेट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर उपलब्ध स्वास्थ्य संबंधी भ्रमित करने वाली जानकारियां हैं। छोटी सी शारीरिक परेशानी की ऑनलाइन जानकारी देखकर कई युवा खुद को गंभीर रोगी मान बैठते हैं। मनोविज्ञान की भाषा में इस स्थिति को साइबरकॉन्ड्रिया कहा जाता है।
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आईएमएस बीएचयू मनोचिकित्सक विभाग के प्रो. संजय गुप्ता का कहना है कि इंटरनेट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का समझदारी से उपयोग करना चाहिए। बिना आवश्यकता और चिकित्सकीय सलाह के ऑनलाइन जानकारी पर निर्भर रहना मानसिक समस्याओं को बढ़ा सकता है।
आम तौर पर किसी तरह की स्वास्थ्य संबंधी समस्या पर युवाओं सहित अन्य लोगों को विशेषज्ञों के पास जाने की सलाह दी जाती हैं। इसके बाद भी युवा इसका पालन नहीं करते हैं। वह जरा सी परेशानी पर बीमारी का इलाज पहले ऑनलाइन माध्यम से खोजने लग जाते हैं। सही जानकारी न मिलने से वे परेशान हो जाते हैं। बीएचयू सहित अन्य अस्पतालों में मनोचिकित्सक के पास हर दिन बड़ी संख्या में ऐसी समस्या लेकर युवा पहुंच रहे हैं।
लंका क्षेत्र की एक लड़की जो बीएचयू में बीएससी जियोलॉजी की पढ़ाई कर रही हैं। पिछले सप्ताह पीरियड्स से जुड़ी समस्या होने पर डॉक्टर से सलाह लेने के बजाय उसने चैटजीपीटी पर जानकारी खोजी। वहां बताए गए लक्षण और संभावित कारण पढ़कर उन्हें लगा कि वह किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं। छात्रा के अनुसार शारीरिक परेशानी उतनी नहीं थी, जितना डर दिमाग में बैठ गया।
केस-2
सुंदरपुर की रहने वाली 25 वर्षीय छात्रा जो जेआरएफ की तैयारी कर रही हैं, उन्होंने कहा कि एक बार सीने में हल्का दर्द होने पर उन्होंने चैट जीपीटी पर सर्च किया। दर्द तो कुछ देर में ठीक हो गया, लेकिन कई दिनों तक डर बना रहा। ऐसा लग रहा था जैसे कुछ गलत हो गया। बाद में जांच में सबकुछ सामान्य निकला, लेकिन मानसिक तनाव खत्म नहीं हुआ।
केस-3
लंका क्षेत्र में एक पीजी में रहने वाली छात्रा जो बीएचयू में बीएससी जियोग्राफी की पढ़ाई कर रही हैं। इन्होंने फिटनेस के लिए एक हेल्थ ऐप डाउनलोड किया था। कभी हार्ट रेट ज्यादा दिखती, कभी नींद कम। वह बताती हैं कि इन आकड़ों को देखकर मैं इंटरनेट पर बीमारियों के बारे में पढ़ने लगी। धीरे-धीरे लगने लगा कि मुझे कोई गंभीर बीमारी है। इसका असर मेरी पढ़ाई पर भी पड़ा। सोशल मीडिया पर वायरल हेल्थ वीडियो और रील्स इस डर को और गहरा कर रही हैं।
आईएमएस बीएचयू मनोचिकित्सक विभाग के प्रो. संजय गुप्ता ने बताया कि इन दिनों लगातार इंटरनेट पर बीमारी से जुड़ी जानकारी खोजने वाले कुछ लोगों में हाइपोकॉन्ड्रिया जैसी बीमारी होती है। इस स्थिति में व्यक्ति को यह भ्रम हो जाता है कि उसे गंभीर बीमारी है या होने वाली है, जबकि जांच में कोई गंभीर रोग सामने नहीं आता। युवाओं को इंटरनेट और एआई का सीमित उपयोग ही करना चाहिए। यही इस मानसिक भ्रम से बचने का उपाय है। हाइपोकॉन्ड्रिया से पीडित व्यक्ति सामान्य शारीरिक लक्षणों जैसे- सिरदर्द, थकान, पेट की आवाज या हल्के दर्द को भी कैंसर, हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियों से जोड़कर देखने लगता है।