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विश्व कविता दिवस 2024: बनारस के इन कवियों ने अल्पायु में ही रचीं अद्भुत कविताएं, किसी ने भी जीवन का 50वां साल नहीं देखा

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बनारस में ऐसे कई स्थान हैं जहां साहित्य समृद्ध हुआ। आज विश्व कविता दिवस पर रू-ब-रू होते हैं ऐसे ही तीन स्थानों और वहां पले-बढ़े कवियों से। इन कवियों ने न सिर्फ देश के सामाजिक परिवेश को बदलने में योगदान दिया। बल्कि समाज को जीने का नया नजरिया प्रदान किया। दुर्भाग्य से इनमें से किसी ने भी जीवन के 50 बसंत नहीं देखे, लेकिन अल्पायु में ही रचा गया इनका कवित्व हमारे लिए अमूल्य थाती है। इस बार की थीम ‘दिग्गजों के कंधे पर खड़े होकर’ भी इसी का आह्वान करती है।
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1- भारतेंदु का जन्म 9 सितंबर 1850 को बनारस के ठठेरी बाजार में हुआ था। उनके पिता गोपालचंद्र भी अच्छे कवि थे। भारतेंदु ने पत्रकार, कवि और नाटककार के रूप में खड़ी बोली हिंदी को भारत में प्रतिष्ठित किया। 6 जनवरी 1885 को सिर्फ 34 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

2- जयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी 1889 को शहर के गोवर्धनसराय में हुआ था। उनका परिवार में तंबाकू का व्यवसाय था पर उनका मन साहित्य के क्षेत्र में अधिक रमा। छायावाद के प्रमुख स्तंभ जयशंकर को टीबी रोग के कारण 15 नवंबर 1937 को 48 साल में दुनिया को अलविदा कह दिया। लेकिन कामायनी, आंसू, लहर आदि रचनाएं लिखकर दुनिया को जीने की नई दिशा दी।
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3-सुदामा पांडेय ‘धूमिल’ का जन्म वाराणसी के खेवली गांव में 9 नवंबर 1936 को हुआ। अपनी कलम से उन्होंने अंग्रेजी सरकार के शोषण के खिलाफ जमकर आवाज बुलंद की। 10 फरवरी 1975 को 38 वर्ष की अल्पायु में ब्रेन ट्यूमर से उनकी मृत्यु हो गई। हालांकि इतने कम समय में उन्होंने ऐसा जादुई लेखन किया जो दमन और विरोध झेल रहे लोगों के बीच हमेशा संबल बनता है।
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