फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

विश्व दिव्यांग दिवस 2025: पिता हाईस्कूल पास, दिव्यांग बेटे ने आईआईटी से की पढ़ाई, बने अधिकारी

Wed, 03 Dec 2025 05:12 PM IST
प्रगति चंद अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

वाराणसी में 52 संस्थाएं दिव्यांगों को सशक्त कर रही हैं। जिले में 27855 दिव्यांग हैं। जबकि 22878 पेंशनधारी हैं। जिले के कई दिव्यांग अपने संघर्ष के दम पर सफलता हासिल कर चुके हैं। 
विज्ञापन
अभिषेक सिंह व सोनी यादव - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

दिव्यांग अभिषेक सिंह के पिता हाईस्कूल पास हैं। अभिषेक ने आईआईटी कानपुर से बीटेक किया और अब दवा कंपनी में अधिकारी हैं। वहीं, अभय शर्मा ने चैनलों पर मिमिक्री से अलग पहचान बनाई। मोहंती यादव दिल्ली विवि में प्रोफेसर बने। काशी में अभी करीब 12 ऐसी संस्थाएं हैं, जहां 2000 से ज्यादा दिव्यांग रहते हैं। ये दिव्यांग विभिन्न क्षेत्रों मेंनाम रोशन करने का लगातार प्रयास कर रहे हैं। 

विज्ञापन


जिला दिव्यांग सशक्तीकरण अधिकारी आरपी सिंह ने बताया कि जिले में 27855 दिव्यांग हैं। जबकि 22878 पेंशनधारी हैं। 52 संस्थाएं उनकी सेवा के लिए पंजीकृत हैं। उन्होंने बताया कि जिले में केंद्र और प्रदेश सरकार की मदद से दो और संस्थान बन रहे हैं। जाल्हूपुर में समेकित विद्यालय बन रहा है। जबकि रामनगर में पुनर्वास केंद्र बनाने के लिए जमीन चिह्नित कर ली गई है। 

10 किए हैं पुरस्कार के लिए आवेदन 

विश्व दिव्यांगता दिवस पर प्रदेश सरकार से उत्कृष्ट कार्य करने वाले दिव्यांगों और दिव्यांगता के क्षेत्र में कार्य करने वालों को सम्मानित किया जाएगा। जिले से भी विभिन्न क्षेत्रों में श्रेष्ठ कार्य करने वाले 10 आवेदन किए गए हैं। इसमें खिलाड़ी, कर्मचारी, संस्थान संचालक शामिल हैं।हनुमान प्रसाद पोद्दार अंध विद्यालय से भी कई दिव्यांगों ने सफलता हासिल की। रघुवर शरण श्रीवास्तव ने भोजपुरी चैनल पर गायन से प्रतिभा का लोहा मनवाया।

सेमेटर परीक्षा की फीस चुकाना मुश्किल था 
आईआईटी कानपुर से अभिषेक सिंह ने 2014 में पास किए। पिता हाईस्कूल पास थे। तब परिवार में कोई स्नातक नहीं था। किरन संस्थान में रहकर प्रारंभिक शिक्षा की। चिरईगांव के बबनपुर के रहने वाले अभिषेक ने कहा कि सीएचएस में प्रवेश तो मिल गया, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर होने से संस्थान के छात्रावास में रहते थे। घर के लोगों को आईआईटी क्या होता है उन्हें पता नहीं था, प्रवेश लेने के बाद सेमेस्टर की फीस भरने में संस्थान ने भी मदद की। अभिषेक अहमदाबाद में दवा कंपनी में अधिकारी हैं।
विज्ञापन

पैंटिंग बेची, कोविड में छूटा जॉब, फिर बनी प्रवक्ता 
डाफी के नयपुरा की सोनी यादव बहों मंतीसरे नंर पर थी। बताया कि घर में शिक्षा का माहौल नहीं था। पिता जी छोटे-मोटे काम कर जीविका चलाते थे। वे किसी तरह बहनों की शादी करने में लगे थे। मुझसे छोटी बहन का भी हो गया। किरन ने संस्थान में पढ़कर बीएचयू में प्रवेश लिया। वह पेंटिंग बनाकर बेचती थीं। दिव्यांगता पेंशन और पार्ट आइम जॉब करती थीं। इसी से खर्च चलाने के साथ फॉर्म भरती थीं। कोविड में यह जॉब भी छूट गया। मगर, केंद्रीय विद्यालय प्रवक्ता के लिए लिखित परीक्षा और मौखिक परीक्षा में सफल हो गईं।  
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें