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गाजे-बाजे संग जनकपुर पहुंची बारात: सिया-राम के जयकारे, रास्ते भर पुष्पवर्षा; रामनगर रामलीला का छठवां दिन

Thu, 01 Oct 2026 06:00 AM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

रामनगर रामलीला के छठवें दिन गाजे-बाजे के साथ राम बरात जनकपुर पहुंची। चारों भाई दूल्हे के रूप में सजे रहे और रास्ते भर श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर स्वागत किया। बरात पहुंचते ही सिया-राम के जयकारे गूंजने लगे। जनकपुर में विवाह प्रसंग को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह रहा। लीला स्थल पर भक्तिमय माहौल बना रहा।
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गाजे-बाजे संग जनकपुर पहुंची बारात। - फोटो : अमर उजाला
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बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं, मुदित देव दुंदुभीं बजावहिं ... अर्थात् अयोध्या से जनकपुर के लिए निकली चारों भाइयों की बारात को देखकर देवसुंदरियों ने फूल बरसाते हुए गीत गाए और देवताओं ने आनंदित होकर नगाड़े बजाए। रामलीला के छठवें दिन बुधवार को धर्मनगरी जनकपुर और अयोध्या अलौकिक उत्सव में डूब गईं।

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श्रीराम और जानकी के विवाहोत्सव के पावन प्रसंग पर ऐसा प्रतीत हुआ, मानो साक्षात देवलोक ही धरती पर उतर आया हो। संपूर्ण लीला परिसर उल्लास, भक्ति और आस्था के सागर में हिलोरे लेता दिखा। तीन किमी में मंचित लीला का शुभारंभ राजा जनक के दूतों के अयोध्या आगमन से हुआ। जनक जी का पत्र पाकर महाराज दशरथ का हृदय आनंद से भर उठा। 

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उन्होंने गुरु वशिष्ठ, भरत तथा अंतःपुर में रानियों को पत्र पढ़कर सुनाया, जिसमें धनुष यज्ञ के भंजन और बारात लाने का सादर निमंत्रण था। राजा दशरथ के आदेश पर भरत जी ने तुरंत बारात की तैयारियां शुरू कर दीं। समूची अयोध्या बाराती बन बैठी। हाथी, घोड़े, भव्य रथ और गाजे-बाजे के साथ बारात जनकपुर के लिए प्रस्थान कर गई। प्रभु की बारात में बड़ी संख्या में नेमी भी शामिल हुए।

जनकपुर पहुंचने पर मिथिला नरेश राजा जनक ने अगवानी कर बारातियों का स्वागत किया और उन्हें आदरपूर्वक जनवासे में ठहराया। उधर, विश्वामित्र के साथ पहले से जनकपुर में उपस्थित श्रीराम और लक्ष्मण भी अपने परिजनों से मिले। इसके बाद जब चारों भाई दूल्हा बनकर सजे-धजे अश्वों पर सवार होकर जनकपुर की गलियों से गुजरे, तो पुरनारियां निहाल हो उठीं। महिलाओं ने मंगल गीत गाते हुए पारंपरिक रीति से चारों दूल्हों का परिछन किया। उधर, देवर्षि नारद के माध्यम से ब्रह्मा जी द्वारा भेजी गई लग्न पत्रिका राजा जनक तक पहुंचाई गई।
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रामलीला का मंचन करते कलाकार। - फोटो : अमर उजाला
शुभ मुहूर्त उपस्थित होते ही राजा जनक ने दूत भेजकर राजा दशरथ और गुरु वशिष्ठ को ससम्मान विवाह मंडप में आमंत्रित किया। मंडप में प्रवेश के साथ ही आकाश से देवताओं ने पुष्पवर्षा की। इसी बीच भगवान शिव माता पार्वती के साथ नंदी पर सवार होकर डमरू बजाते हुए पहुंचे। चारों ओर ‘हर-हर महादेव’ के उद्घोष से संपूर्ण वातावरण गुंजायमान हो उठा। महादेव ने इस युगल मिलन को संपूर्ण चराचर जगत के लिए परम कल्याणकारी बताया।

वैदिक मंत्रोच्चार के बीच महारानी सुनयना ने चांदी के कलश से श्रीराम के चरण पखारे और उस चरणोदक को पांच बार अपनी आंखों से लगाया। गुरु वशिष्ठ के निर्देशन में विधि-विधान से श्रीराम-सीता का विवाह संपन्न हुआ। इसके पश्चात मांडवी का विवाह भरत, उर्मिला का विवाह लक्ष्मण तथा श्रुतकीर्ति का विवाह शत्रुघ्न के साथ संपन्न हुआ। सखियों ने दूल्हा-दुल्हन को कोहबर में ले जाकर आरती उतारी और पूजन कराया। अंत में जयकारों और भव्य महाआरती के साथ लीला को विश्राम दिया गया।
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