काशी की पंचक्रोशी और अंतरगृही यात्रा की तरह ही वेदव्यासेश्वर यात्रा का महत्व है। 11 महीने काशी में दर्शन के बाद माघ महीने में वेदव्यासेश्वर के दर्शन का विधान है। माघ शुक्ल द्वितीया यानी रविवार को वेदव्यासेश्वर की यात्रा आरंभ होगी। महाभारत काल से चली आ रही दर्शन-पूजन की परंपरा आज भी जारी है।
श्री काशी प्रदक्षिणा समिति के संयोजक उमाशंकर गुप्त ने बताया कि वेदव्यासेश्वर यात्रा की शुरुआत रविवार को अस्सी से होगी। इसके रामनगर में दुर्गाजी के पोखरे पर स्नान और दर्शन के बाद यात्री चांदीतारा गांव में व्यासेश्वर महादेव के दर्शन के लिए रवाना होंगे। अभी तक 900 लोगों ने यात्रा के लिए पंजीकरण कराया है। भगवान को बाटी-चोखा का भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करेंगे। माघ महीने में शुक्ल पक्ष में वेदव्यासेश्वर महादेव के दर्शन का विधान है।
महाभारत काल से आरंभ होती है यात्रा की कहानी
उमाशंकर गुप्त ने बताया कि वेदव्यासेश्वर महादेव की यात्रा की कहानी महाभारत काल से आरंभ होती है। पुराणों के अनुसार वेदव्यास काशी की महिमा को सुनकर यहां आए लेकिन किसी ने भी उनका आदर सत्कार नहीं किया। इससे नाराज होकर वह गंगा पार चले गए। संकल्प लिया कि यहीं पर वह छोटी काशी बसाएंगे और लोगों को मुक्ति प्रदान करेंगे। इसके बाद देवी-देवताओं में हलचल मच गई। उन्होंने भगवान गणेश को वेदव्यास को मनाने के लिए भेजा। गणेश जी कई बार वेदव्यास जी को मनाने पहुंचे। बाद में देवताओं ने आशीर्वाद दिया कि जो भक्त 11 महीने काशी में और एक महीने वेदव्यासेश्वर का दर्शन करेंगे, उनको ही काशी दर्शन का फल मिलेगा। वर्तमान में वेदव्यासेश्वर महादेव चंदौली में हैं।
25 लोगों से शुरू हुई थी यात्रा
उमाशंकर गुप्त ने बताया कि उन्होंने वेदव्यासेश्वर महादेव की यात्रा की शुरुआत 25 लोगों के साथ की थी। वर्तमान में यह संख्या 900 से ऊपर पहुंच चुकी है। एकादशी और सोमवार को छोड़कर माघ शुक्ल पक्ष में यात्रा और दर्शन का विधान है। प्राचीन परंपरा को जीवित करने के लिए हर साल यह यात्रा की जाती है।