कचहरी स्थित बाबा दैत्रावीर मंदिर के पास बरगद के पेड़ की पूजा के लिए काफी भीड़ रही। ईश्वरगंगी कुंड, लक्ष्मीकुंड, किरहिया, लाटभैरव, काशीपुरा, लोहटिया, शिवाला, अस्सी, शंकुलधारा और नरसिंह चबूतरा आदि क्षेत्रों में बरगद के पेड़ की पूजा हुई। आचार्य दैवज्ञ कृष्ण शास्त्री ने कहा कि धार्मिक मान्यता के अनुसार वटवृक्ष के मूल में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शीर्ष पर भगवान शिव का वास माना जाता है। यह वट सावित्री व्रत सौभाग्य देने के साथ संतान प्राप्ति में भी सहायक माना जाता है। भारतीय संस्कृति में यह व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक है।
ग्रामीण क्षेत्रों में भी पूजन को रही भीड़: ग्रामीण इलाकों में भी महिलाओं ने वट सावित्री व्रत रखकर वटवृक्ष की पूजा की और पति की दीर्घायु व अखंड सौभाग्य की कामना की। नवविवाहिताओं और सुहागिन महिलाओं ने पूजन किया। सारनाथ के रसूलगढ़ आदि इलाकों में भी पूजा-अर्चना हुई। पिंडरा, हरहुआ, राजातालाब, मिर्जामुराद, सेवापुरी, बड़ागांव, रोहनिया, चोलापुर, चिरईगांव और चौबेपुर आदि क्षेत्रों में पूजन के लिए महिलाओं की भीड़ रही।
राष्ट्रीय वृक्ष बरगद के संरक्षण के लिए पूजा की
सिद्धेश्वरी स्थित माता संकटा मंदिर में सैकड़ों वर्ष पुराने वटवृक्ष की पूजा के लिए महिलाओं की भीड़ रही। नमामि गंगे के सदस्यों ने वायुमंडल में सर्वाधिक ऑक्सीजन उत्सर्जित करने वाले राष्ट्रीय वृक्ष बरगद की पूजा की और इसके संवर्धन व पर्यावरण संरक्षण के लिए आरती उतारी। पूजा में संस्था के संयोजक राजेश शुक्ला, सरोज वर्मा, समृद्धि वर्मा, अर्चना मिश्रा और ऋचा चोपड़ा आदि शामिल रहीं।