सवालों में घिरी वरुणा कॉरिडोर योजना में एक और बड़ी लापरवाही उजागर हुई है। एक तरफ नालों से वरुणा में रोजाना गाद भर रही है, दूसरी तरफ उसी गाद को हटाने के लिए ड्रेजिंग पर लाखों रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे हैं।
हैरानी की बात यह है कि यह सब कुछ उच्चाधिकारियों की आंखों के सामने हो रहा है लेकिन कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है। जबकि, 14 बड़े नाले वरुणा में गिर रहे हैं। नदी और पर्यावरण संरक्षण के जानकारों का कहना है कि कॉरिडोर के लिए नदी की ड्रेजिंग कराने से पहले नालों को बंद कराया जाना चाहिए था।
जब तक वरुणा में नालों का गिरना नहीं रुकेगा तब तक ड्रेजिंग कराने का कोई फायदा नहीं, यह सिर्फ सरकारी धन की बरबादी है। जानकारों की मानें तो जिस तरह जेएनएनयूआरएम के तहत बिना एसटीपी का निर्माण कराए सीवर पाइप लाइन डालने के लिए पूरे शहर को खोद डाला गया था।
कुछ उसी तरह का खेल अब वरुणा कॉरिडोर में चल रहा है। पहले नाले-नालियों को वरुणा में गिरने से रोकने की व्यवस्था की जानी चाहिए औी उसके बाद ड्रेजिंग शुरू कराई जानी चाहिए थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ड्रेजिंग शुरू करा दी और नालों को रोकने का प्रबंध अब तक नहीं किया।
इंटरसेप्टर पाइप लाइन की योजना बनी लेकिन पहले उसे पूरा कराने के बजाए कार्यदायी संस्था और निगरानी का जिम्मा संभालने वाले उच्चाधिकारियों ने ताकत ड्रेजिंग कराने में ही झोंक दी। मौजूदा समय भी जेसीबी मशीनों से ड्रेजिंग कर गाद और सिल्ट हटाने का काम कराया जा रहा है।
नदी विशेषज्ञ और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोग इससे हैरान हैं। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मनीष कुमार का कहना है कि जब एक तरफ से गाद और सिल्ट रोजाना नदी में भर रही है तो दूसरी तरफ से कितनी भी ड्रेजिंग कराई जाए, उससे क्या फायदा होगा।
कुछ दिनों में स्थिति फिर जस की तस हो जाएगी। यह पूरी तरह से सरकारी धन का दुरुपयोग है। बीएचयू के नदी विज्ञानी प्रो. यूके चौधरी भी ऐसा ही मानते हैं। उनका कहना है कि पहले नालों को रोका जाना चाहिए था। उसके बाद ही ड्रेजिंग कराई जानी चाहिए थी।