दशकों पुराने मामले और न्याय की धीमी गति
वाराणसी की अदालतों में तीन ऐसे मामले भी हैं जो साल 1970 से चल रहे हैं। इन मामलों की सुनवाई 56 साल से जारी है, जो न्याय में अत्यधिक देरी का एक गंभीर उदाहरण है। कई बड़े मामलों में काउंसिल की लापरवाही भी सुनवाई में विलंब का एक प्रमुख कारण बनी है। यह स्थिति उन फरियादियों के लिए निराशाजनक है जो दशकों से न्याय की आस में बैठे हैं। ऐसे पुराने मामलों का लंबित रहना अदालतों पर अतिरिक्त दबाव डालता है। 639 मामलों में विधिक उत्तराधिकारी ही नहीं, 63 मामलों में रिकॉर्ड ही नहीं लंबित मामलों में 639 ऐसे मामले हैं जिसमें दीवानी मुकदमे के दौरान वादी का निधन हो गया। पत्नी, पुत्र, पुत्री या अन्य को वैध उत्तराधिकारी के रूप में शामिल किया जाता है। 639 मामले ऐसे हैं जिसमें विधिक उत्तराधिकारी सामने नहीं आए। इस वजह से ये मामले लंबित पड़े हैं। 63 ऐसे मामले हैं जिसमें अदालत में रिकॉर्ड ही नहीं। 214 मामलों में हाईकोर्ट से स्टे है।
मामलों के निस्तारण के लिए अभी 32 कोर्ट की कमी है। वर्तमान में 44 कोर्ट हैं। इस बाबत हाईकोर्ट को पत्रक सौंपा गया है। बार काउंसिल को भी अवगत कराया गया है। कोर्ट की संख्या बढ़ेगी तभी तेज से निस्तारण होगा। -प्रेम प्रकाश गौतम, अध्यक्ष सेंट्रल बार एसोसिएशन
अंग्रेजों के समय से चली आ रही व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं हुआ। पहले आदेश तुरंत आते थे जबकि अब आदेश आने लिए भी कोर्ट डेट दे देता है। साथ ही मैन पावर की कमी भी है। कोर्ट नियमित संचालित नहीं हो रहा, अवकाश की वजह से भी मामले प्रभावित होते हैं। -श्रीनाथ त्रिपाठी, सदस्य बार काउंसिल ऑफ इंडिया