सारनाथ के उत्खनन क्षेत्र में लगे शिलापट्ट पर अंकित विवरण गलत हैं। शिलापट्ट पर अंकित है कि बाबू जगत सिंह काशी नरेश चेत सिंह के दीवान थे। जबकि ऐसा नहीं है। इसके अलावा ये भी अंकित है कि इस स्थान की खोदाई सर्वप्रथम कर्नल सी मैकेंजी या कनिंघम ने 1815 और कराई जबकि उन्होंने खुदाई क्रमशः 1815 एवं 1834-36 में कराई जबकि बाबू जगत सिंह ने सबसे पहले यहां की खोदाई 1787 में ही कराई थी।
ये बातें प्रो. राणा पीबी सिंह ने बुधवार को अशोक मिशन एजुकेशनल सोसाइटी की ओर से आयोजित एकल व्याख्यान के तहत अज्ञात का अन्वेषण, सारनाथ खोज की गुत्थी विषयक व्याख्यान में कहीं। लहुराबीर स्थित होटल में आयोजित व्याख्यान में प्रो. सिंह ने कहा कि उत्खनन में दो बेलनाकार मंजूषा के मिलने के उपरांत उत्खनन कार्य रोक दिया गया था। मंजूषाओं को एशियाटिक सोसायटी कोलकाता को सौंप दिया गया था। यह संपूर्ण विवरण आज भी एशियाटिक सोसाइटी ऑफ कोलकाता के रजिस्टर में दर्ज है। उन्होंने लास्ट हीरो ऑफ बनारस- बाबू जगत सिंह पुस्तक के तृतीय अध्याय का उल्लेख करते हुए सारनाथ में लगे शिलापट्ट पर अंकित विवरण को ठीक करने का अनुरोध भी भारत सरकार से किया। संचालन अशोक आनंद और धन्यवाद ज्ञापन डॉक्टर अरविंद कुमार सिंह ने किया। इस अवसर पर जैनेंद्र कुमार राय, राजेश्वर सिंह, राजेंद्र पांडेय, विक्रम मेहरोत्रा, डॉ रामसुधार सिंह उपस्थित रहे।