काशी के युवा विद्वान पं सात्विक जाडिहाल ने हेत्वाभास के विभिन्न आयामों पर न्यायशास्त्रीय क्रोडपत्रों के आधार पर समीक्षा की। पुणे के नैयायिक पं. राजेश्वर देशमुख ने शब्द प्रमाण की आवश्यकता का प्रतिपादन करते हुए न्याय एवं वैशेषिक मत की गंभीर विवेचना की।
द्वितीय सत्र में गोवा के विद्वान पं. दत्तानुभव टेंगसे ने सामान्य लक्षणा सन्निकर्ष को केंद्र बनाकर न्याय एवं वेदांत मत की तुलनात्मक समीक्षा की तथा वेदांत मत को सिद्धांत के रूप में प्रतिष्ठित करते हुए सामान्य लक्षणा का निराकरण किया। तिरुपति के आचार्य रामलाल शर्मा ने हेत्वाभास के लक्षण का कालीशंकर भट्टाचार्य द्वारा समर्थित स्वरूप पर विमर्श किया।
काशी के कुप्पा विश्वनाथ एवं रामकृष्ण मिश्र ने क्रमशः व्याकरण एवं वेदांत के सिद्धांतों पर आधारित शास्त्रार्थ प्रस्तुत किया। चर्चा में पं. मणि द्रविड़ शास्त्री, पं. प्रियव्रत पाटिल, आचार्य ब्रजभूषण ओझा, पं. ज्ञानेंद्र सांपकोटा आदि विद्वानों ने भाग लिया। सभा का शुभारंभ तिरुपति से आये आचार्य गणपति भट्ट ने वैदिक मंगलाचरण से किया। विद्वानों का स्वागत पं. जगजीतन पांडेय ने किया।