चोलापुर की एक महिला घरेलू हिंसा और मानसिक प्रताड़ना का शिकार थीं। घर से निकाले जाने के बाद वह पूरी तरह टूट चुकी थीं। रीता ने चोलापुर वन स्टॉप सेंटर में शरण ली। सेंटर प्रभारी पूजा सिंह ने उनकी काउंसिलिंग की, उन्हें कानूनी सहायता भी दिलाई गई। इसके बाद उन्हें एक स्थानीय हस्तकला एनजीओ से जोड़ा, जहां उन्होंने बनारसी सिल्क की बुनाई और डिजाइनिंग सीखी। आज वह स्वयं सहायता समूह के माध्यम से अपने उत्पाद ऑनलाइन बेच रही हैं और सम्मानजनक जीवन जी रही हैं।
पांडेयपुर निवासी एक महिला के पति की मृत्यु के बाद उन पर दो बच्चों की जिम्मेदारी आ गई थी। आय का कोई साधन न होने के कारण वह अवसाद में थीं। वन स्टॉप सेंटर के माध्यम से उन्हें मनोवैज्ञानिक परामर्श मिला और उनकी रुचि के अनुसार उन्हें स्वयं सहायता समूह के माध्यम से खाद्य प्रसंस्करण का प्रशिक्षण दिलाया गया। आज वह अपना छोटा सा अचार और पापड़ का स्टार्टअप चला रही हैं। वह महीने के 20 से 25 हजार रुपये कमा रही हैं और अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ा रही हैं।
हमारे पास आने वाले अधिकतर मामलों में संवाद की कमी एक बड़ा कारण होती है। काउंसिलिंग के जरिये हम 60 से 70 प्रतिशत पारिवारिक विवादों को आपसी सहमति से सुलझाने में सफल हो रहे हैं। वहीं, जो महिलाएं आर्थिक रूप से कमजोर हैं, उन्हें स्वयं सहायता समूहों से जोड़कर हम उनके स्वावलंबन का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं, ताकि वे किसी पर निर्भर न रहें। - रश्मि दुबे, प्रभारी, वन स्टॉप सेंटर।