पांच पीढ़ी से काशी में हैं। काशी और तमिलनाडु का गहरा संबंध है, क्योंकि वहां के लोगों को काशी आना जरूरी है। गंगाजल से तर्पण, बाबा विश्वनाथ, मां विशालाक्षी और बाबा कालभैरव का दर्शन जरूरी है। गंगा के तट पर हमारी आबादी 10 हजार है। सुब्रमण्यम भारती काशी आए और उन्होंने अपनी कविता हनुमान घाट पर की। जो काशी में रम जाता है वह काशीवासी हो जाता है। हम लोग तो भोजपुरी भी बोलते हैं। - के वेंकटरमन घनपाठी, तमिल समाज
- 1966 में पिताजी काशी आए और यहीं के रह गए। काशी के निर्माण में मराठी समाज को बहुत योगदान है। भोसले, शिंदे, होलकर, पेशवा सभी ने काशी में घाट बनाए। अहिल्याबाई होल्कर ने श्री काशी विश्वनाथ मंदिर और घाटों का जीर्णोद्धार कराया। मराठी संतों में संत एकनाथ, संत ज्ञानेश्वर काशी आए थे। मराठी समाज के विद्वानों ने शास्त्र, वेद अध्ययन, ज्योतिष, कर्मकांड, आयुर्वेद, पत्रकारिता, विज्ञान, चित्रकला, संगीत, कुश्ती में योगदान दिया। - अनिल किंजवेड़कर, मराठी समाज
- 1850 के दशक में लोटा लेकर मारवाड़ी समाज के लोग व्यापार की खोज में राजस्थान से निकले थे। 1880 में काशी पहुंचे। धर्म के प्रति समर्पण हमारे डीएनए में है। दंडी सन्यासियों के भोजन व आवास के लिए 1920 में काशी मुमुक्षु भवन की स्थापना हुई। हम जहां गए वहां की भाषा और संस्कार को अंगीकार किया। वर्तमान में 10 हजार मारवाड़ी परिवार हैं। लगभग 50 हजार परिवारों को मारवाड़ी समाज की ओर से संचालित उद्योग से रोजगार मिल रहा है। हमारा देश की जीडीपी में 12.5 प्रतिशत का योगदान है। - उमाशंकर अग्रवाल, मारवाड़ी समाज
- 1880 में पूर्वज काशी आए और हम बस गए। वर्तमान में काशी में तेलुुगु समाज के श्रद्धालुओं की संख्या सबसे अधिक है। काशी में मृत्यु से मोक्ष का भाव प्रबल होने के कारण लोग काशीवास को प्राथमिकता देते हैं। गंगा घाट के मोहल्लों में तेलुगु समाज की 10 हजार आबादी है। दक्षिण भारत में मान्यता है कि बिना काशी गए मुक्ति नहीं मिलती है। चल विश्वनाथ की मान्यता वाले तैलंग स्वामी आंध्र प्रदेश से काशी आए और यहीं के रह गए। आजादी के बाद बीएचयू के प्रथम कुलपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन रहे। - चल्ला सुब्बा राव शास्त्री, तेलुगु समाज