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Varanasi News: अमर उजाला संवाद, काशी की गलियों में है लघु भारत, तेलुगु-तमिल भाषी बोलते हैं भोजपुरी

Sun, 30 Nov 2025 04:04 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

अमर उजाला के वाराणसी कार्यालय में संवाद कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इसमें शामिल गणमान्य लोगों ने काशी और इसके संस्कृति को लेकर चर्चा की। इसके साथ ही इतिहास के बारे में भी बताया।
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अमर उजाला के संवाद कार्यक्रम में उपस्थित गणमान्य। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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Varanasi News: शिव की नगरी काशी में पूरा हिंदुस्तान बसता है। बनारस की गलियों में देश के सभी धर्म, संप्रदाय और समाज के लोग कई पीढि़यों से रह रहे हैं। अब तो वह पूरी तरह से काशीवासी हो चुके हैं। उन्होंने यहां की संस्कृति के साथ ही बोलचाल, भाषा, खानपान को भी अपना लिया है। बनारस से बाहर जाने के बाद भी उनकी शैली बता देती है कि वह काशी से ही आए हैं। अमर उजाला संवाद में भी लघु भारत की झलक देखने को मिली। 

  • 1947 में सिंधी समाज के लोग काशी आए और अपने पुरुषार्थ के बल पर खुद को स्थापित किया। अब हम सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से स्थापित हो चुके हैं।  - रमेश लालवानी, सिंधी समाज
  • काशी सभी धर्मों की प्रकाश स्थली है। यह ऐसी धरती है जहां हम जितना खोजेंगे उतना पाएंगे। सभी संत महापुरुष काशी आए। काशी ने सभी को प्रमाणित किया।  - महंत गोविंद दास, कबीर पंथ
  • मध्य प्रदेश से आया और यहीं का होकर रह गया। चार तीर्थंकरों की जन्म भूमि के दर्शन के लिए हर साल जैन समाज के लोग आते हैं। यहां जैन समाज की संख्या 10 हजार है। - सुरेंद्र जैन, जैन समाज
  • काशी हमारी आत्मा में बसती है यह अपने आप में पूरा हिंदुस्तान है। सिंधी समाज का देश की जीडीपी में आठ प्रतिशत योगदान है। - शंकर विशनानी, सिंधी समाज
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  • काशी में अपने आप में हिंदुस्तान नजर आता है। जो भी काशी आता है अपने साथ संदेश लेकर जाता है। वह काशी को भूलता नहीं है। - धर्मवीर सिंह, मुख्य ग्रंथी, गुरुद्वारा गुरुबाग
  • सिख धर्म के गुरु गुरुनानक देव जी सबसे पहले काशी आए थे। वर्तमान में यहां सिख समाज के साढ़े तीन सौ परिवार हैं। - सन्नी जौहर, सिख समाज
  • 1984 में मेरे दादा काशी आए और हम सब यहीं बस गए। सिख समाज का तो जुड़ाव गुरु नानक देव के काल से ही काशी से रहा है। हम भले ही कम संख्या में हैं लेकिन हमारी बात सुनी जाती हैं। - दलवीर सिंह, सिख समाज
  • काशी गुरु कबीर-रविदास की धरती है। भगवान बुद्ध ने भी अपना पहला उपदेश काशी में ही दिया था। - आचार्य भरत भूषण दास, रविदास पंथ
  • हमारे पूर्वज विभाजन से पहले काशी आते थे और विभाजन के बाद काशी ही आकर बस गए। रामनगर से लेकर बनारस तक सिख समाज को बसाने में काशी नरेश ने बहुत योगदान किया। वह लोगों से सिख समाज की मदद की अपील किया करते थे और खुद भी उन्होंने काफी मदद की। काशी के लोगों की ही देन है कि हम यहां बस गए। 84 के दंगों के बाद हम लोगों को काशी छोड़नी भी पड़ी लेकिन अब सब ठीक है। हम लोग अपनी भाषा में बनारसी भाषा का भी इस्तेमाल करते हैं। - अमरजीत सिंह, सिख समाज
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पांच पीढ़ी से काशी में हैं। काशी और तमिलनाडु का गहरा संबंध है, क्योंकि वहां के लोगों को काशी आना जरूरी है। गंगाजल से तर्पण, बाबा विश्वनाथ, मां विशालाक्षी और बाबा कालभैरव का दर्शन जरूरी है। गंगा के तट पर हमारी आबादी 10 हजार है। सुब्रमण्यम भारती काशी आए और उन्होंने अपनी कविता हनुमान घाट पर की। जो काशी में रम जाता है वह काशीवासी हो जाता है। हम लोग तो भोजपुरी भी बोलते हैं। - के वेंकटरमन घनपाठी, तमिल समाज
  • 1966 में पिताजी काशी आए और यहीं के रह गए। काशी के निर्माण में मराठी समाज को बहुत योगदान है। भोसले, शिंदे, होलकर, पेशवा सभी ने काशी में घाट बनाए। अहिल्याबाई होल्कर ने श्री काशी विश्वनाथ मंदिर और घाटों का जीर्णोद्धार कराया। मराठी संतों में संत एकनाथ, संत ज्ञानेश्वर काशी आए थे। मराठी समाज के विद्वानों ने शास्त्र, वेद अध्ययन, ज्योतिष, कर्मकांड, आयुर्वेद, पत्रकारिता, विज्ञान, चित्रकला, संगीत, कुश्ती में योगदान दिया। - अनिल किंजवेड़कर, मराठी समाज
  • 1850 के दशक में लोटा लेकर मारवाड़ी समाज के लोग व्यापार की खोज में राजस्थान से निकले थे। 1880 में काशी पहुंचे। धर्म के प्रति समर्पण हमारे डीएनए में है। दंडी सन्यासियों के भोजन व आवास के लिए 1920 में काशी मुमुक्षु भवन की स्थापना हुई। हम जहां गए वहां की भाषा और संस्कार को अंगीकार किया। वर्तमान में 10 हजार मारवाड़ी परिवार हैं। लगभग 50 हजार परिवारों को मारवाड़ी समाज की ओर से संचालित उद्योग से रोजगार मिल रहा है। हमारा देश की जीडीपी में 12.5 प्रतिशत का योगदान है। - उमाशंकर अग्रवाल, मारवाड़ी समाज
  • 1880 में पूर्वज काशी आए और हम बस गए। वर्तमान में काशी में तेलुुगु समाज के श्रद्धालुओं की संख्या सबसे अधिक है। काशी में मृत्यु से मोक्ष का भाव प्रबल होने के कारण लोग काशीवास को प्राथमिकता देते हैं। गंगा घाट के मोहल्लों में तेलुगु समाज की 10 हजार आबादी है। दक्षिण भारत में मान्यता है कि बिना काशी गए मुक्ति नहीं मिलती है। चल विश्वनाथ की मान्यता वाले तैलंग स्वामी आंध्र प्रदेश से काशी आए और यहीं के रह गए। आजादी के बाद बीएचयू के प्रथम कुलपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन रहे। - चल्ला सुब्बा राव शास्त्री, तेलुगु समाज
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