वाराणसी नगर निगम कार्यकारिणी का चुनाव आठ साल बाद हुआ है। इससे पहले की सभी कार्यकारिणी चुनावी विरोध और न्यायालयों में विचाराधीन हो गई था।
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महापौर कौशलेंद्र सिंह का कार्यकाल 2007 से 2012 तक रहा। इसमें पहले और दूसरे साल कार्यकारिणी का चुनाव हुआ। बाद में विरोध हो गया और तीन साल तक चुनाव नहीं हुआ। इसके बाद राम गोपाल मोहले महापौर चुने गए।
इनके कार्यकाल में जैसे ही चुनाव के लिए सदन की बैठक हुई, विरोध और हंगामा हो गया। इसके बाद मामला न्यायालय में चला गया और पांच साल तक कार्यकारिणी सदस्य नहीं चुने गए।
नगर निगम में पहले साल कार्यकारिणी का चुनाव सदस्यों के आधार पर होता है। इन सदस्यों का कार्यकाल एक साल रहेगा। इसके बाद चुने गए सदस्यों में से आधे सदस्यों को लाटरी के माध्यम से बाहर किया जाता है और बाकी के सदस्य सर्वसम्मति से नए सदस्यों को चुनकर संख्या पूरी करते हैं।
अगर सर्वसम्मति की स्थिति नहीं बनती है तो चुनाव होता है। यह कार्यकाल दो साल का होता है। बाकी के बचे दो साल में फिर एक-एक साल के लिए चुनाव होता है।
अफसरों की मनमानी के आगे मजबूर थे पार्षद
मेयर का समर्थन करते कांग्रेस पार्षद दल के नेता
- फोटो : अमर उजाला
कार्यकारिणी का चुनाव सभी दलों की मजबूरी थी। दरअसल, कार्यकारिणी का चुनाव होने के बाद शहर के विकास का कोई भी प्रस्ताव कार्यकारिणी की सहमति के बगैर पास नहीं होता है।
कार्यकारिणी नहीं होने पर अधिकारी अपने मन से ही उसे पास कर काम करा देते हैं। आठ महीने से कार्यकारिणी का चुनाव नहीं होने से अधिकारियों की मनमानी चल रही थी। पार्षदों को मतलब ही नहीं रह गया था।
कुछ इलाकों में तो पार्षदों के कहने के बाद भी चौका बिछाना तो दूर सीवर की सफाई तक नहीं हो पाती थी। विपक्षी पार्षद तो आरोप लगाकर और हो-हल्ला कर लेते थे लेकिन भाजपा के पार्षदों की हालत ज्यादा खराब थी।
चुनाव के दौरान पार्षदों के अलावा विधायक रवींद्र जायसवाल, सौरभ श्रीवास्तव, एमएलसी केदारनाथ सिंह, अशोक धवन, चेतनारायण सिंह तो उपस्थित थे लेकिन राज्यमंत्री डॉ. नीलकंठ तिवारी लखनऊ में थे।
कुछ पार्षदों आरोप लगाया कि मंत्री नहीं चाहते थे कि कार्यकारिणी का चुनाव हो। हालांकि भाजपा पार्षद नरसिंह दास और पार्षद दल के नेता राजेश जायसवाल ने कहा कि मंत्री लगातार संपर्क में थे।
उन्होंने कहा था कि अगर चुनाव की स्थिति बनी तो चार्टर प्लेन या हेलीकॉप्टर से एक घंटे के अंदर वाराणसी आ जाएंगे। चुनाव की नौबत नहीं आई, इसलिए वह लखनऊ में रहे।