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फिल्मी नगमों के राजकुमार ‘अंजान’ को जयंती पर भूली काशी

Sun, 29 Oct 2017 01:07 PM IST
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
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गांव के लोगों को भी पता नहीं, परिवारवाले पुरानी यादों को ताजा कर हुए भावुक - फोटो : self
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सत्तर के दशक में के बाद ‘ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना...’ ‘खइके पान बनारस वाला...’ और मुझे ‘नौलखा मंगा दे रे ओ सैंया दीवाने...’ जैसे अमर गीत रचकर हर किसी के दिलों पर राज करने वाले गीतकार लालजी पांडेय ‘अंजान’ के प्रति लोगों में दीवानगी अब भी उसी तरह है।
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गीतों में अंजान भले अमर हो गए लेकिन जयंती पर शनिवार को काशी उन्हें भूल गई। पैतृक गांव पिंडरा के ओदार गांव में भी लोगों को उनकी जयंती याद नहीं रही। मकान में ताला लटकता रहा।

जाने माने गीतकार अंजान पैतृक घऱ पर शनिवार को उनके चचेरे बड़े भाई देवमूरत पांडेय मिले। उन्होंने ‘अमर उजाला’ से बातचीत में अंजान की संगीत यात्रा से जुड़े पहलुओं को साझा किया। अंजान का नाम आते ही वह भावुक हो उठे।
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पुरानी यादों को ताजा करते हुए उन्होंने बताया कि लालजी को बचपन से ही उनको गाने और लिखने का शौक था। सिनेमा भी खूब देखते थे। उन्होंने बताया कि तब गांव में स्कूल नहीं था। समीप के गांव कोरौत में उनका नाम लिखवाया गया था।

वह कक्षा दो तक पढ़ाई करने के बाद उनके पिता उन्हें अपने साथ चौक ले गए। उनके पिता शिवनाथ पांडेय बनारस के चौक में सेंट्रल बैंक में कर्मचारी थे।
गीतों में रमे लालजी का मन बहुत दिनों तक बनारस में नहीं लगा।

अंतत: वह मुंबई पहुंचे और फिल्मों के लिए गीत लिखने लगे। करिश्माई व्यक्तित्व के धनी अंजान ने अपने कॅरियर की शुरुआत अमिताभ बच्चन पर फिल्माए गए अपने नगमों से की। 

अंजान के छोटे पुत्र गीतकार समीर फिल्म जगत में उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, जबकि छोटे पुत्र चंद्रशेखर बनारस में रहते हैं। अंजान के पारिवारिक सदस्य संतोष पांडेय ने स्वीकार किया कि उनकी जयंती की तारीख लोग याद नहीं रख सके थे।

उनका कहना था कि अब उनके जन्मदिन से लोग अंजान नहीं रहेंगे। अगले साल से उनकी जयंती गांव में मनाई जाएगी। पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने मंगारी-सिंधोरा मार्ग का नामकरण गीतकार अंजान के नाम पर किया था। 
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अमिताभ के लिए कई सफल गीत लिखे

लालजी पांडेय ‘अंजान’ - फोटो : अमर उजाला
1976 में बनी फिल्म ‘दो अनजाने’ के लिए लिखे उनके गीत लुक छिप लुक छिप जाओ ना.. की कामयाबी के बाद उन्होंने अमिताभ के लिए कई सफल गीत लिखे। जिनमें वर्षों पुराना ये याराना... खून पसीने की जो मिलेगी तो खाएंगे... रोते हुए आते हैं सब... जैसे सहाबहार गीत शामिल हैं।


24 अक्टूबर 1929 को बनारस में पैदा हुए अंजान ने बीएचयू से बी.कॉम की पढ़ाई की। लेकिन बीमारी और बेहतर आबो-हवा की ख़ातिर वो 1953 में मुंबई आ गए। ज़िंदगी को दोबारा शुरू करने के लिए यहां आकर उन्होंने मुकेश से मुलाक़ात की। जिसके बाद मुकेश ने उन्हें निर्देशक प्रेमनाथ से मिलवाया, जो अपनी फ़िल्म के लिए किसी गीतकार की तलाश में थे।

अंजान ने प्रेमनाथ की प्रिजनर ऑफ गोलकोंडा के लिए गाने लिखे। लेकिन गाने मक़बूल नहीं हुए। पहली फ़िल्म मिलने के बाद भी शोहरत उन्हें काफ़ी बाद में जाकर मिली। अंजान ने वैसे तो अपने समय के सभी दिग्गज संगीतकारों के साथ काम किया, लेकिन कल्याणजी-आनंदजी के साथ उनकी जोड़ी कमाल की रही।

हिंदी सिनेमा को एक से एक नायाब गीत देने वाले इस गीतकार को अपने कुछ गीतों पर एतराज़ भी रहा। अंजान को एक बात का और भी रंज रहा कि कई सदाबहार नग़मे लिखने के बावजूद उन्हें फ़िल्म फेयर का अवॉर्ड नहीं दिया गया।

सिनेमा को क्षेत्रियों बोलियों की महक से रू-बू-रू कराने वाले अज़ीम फ़नकार अंजान आख़िर इस दुनिया से 13 सितंबर 1997 को कूच कर गए। गीतों के रूप में उनका बेशक़ीमती ख़ज़ाना आज भी लोगों की ज़बान पर है।
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