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ऑनलाइन काव्य गोष्ठी का श्रोताओं ने उठाया लुत्फ

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वाराणसी। लॉकडाउन में भी बनारस का रस निरंतर प्रवाहमान है। प्रमिला देवी फाउंडेशन की ओर से बृहस्पतिवार को कवियों ने ऑनलाइन मंच से एक से बढ़कर एक प्रस्तुतियां दीं। कवि सम्मेलन का शुभारंभ अमरोहा से शामिल कवि मुजाहिद चौधरी एडवोकेट ने अपनी रचना मैं नफरत करने वाले हर बशर को मौत दे देता, मैं इंसां हूं किसी का भी मुकद्दर लिख नहीं सकता... से की।
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बनारस से संगीता श्रीवास्तव ने तेरी यादों के सागर में नहाना रोज पड़ता है, हमें शोलों के ऊपर से गुजरना रोज पड़ता है...। बिलासपुर से रश्मिलता मिश्रा ने हिंदुस्तानियों गर्व हिंदुस्तान है... सुनाया। उन्होंने दूसरी रचना ये कैसे दिन आ गए हैं, तन कंटक मन बाण लगे हैं... सुनाकर कोरोनाकाल पर प्रहार किया। काशी से श्रुति प्रकाश ने हाल दिल का तुम्हें बताना है, पास बैठो कि हक जताना है... सुनाकर वाहवाही लूटी। डॉ. नसीम निशा ने गजल घर मिटानी है नफरत सदा के लिए खोल दो रास्ते सब वफा के लिए... गुनगुनाया।
बनारस के सीताराम राय विक्रांत बनारसी ने सुनाया समझा जिन्हें था अपना वही चाल चल गए, प्यार की छांव में पांव जल गए...। उन्होंने दूसरी रचना मोम की छांव में पत्थर के खानदानों को, मोम की तरह पत्थरों को पिघलते देखा... सुनाई। अंत में नवाब अहमद ने वतन से किसको है उल्फत तुम्हें मालूम तो होगा, मेरी रग रग में है भारत तुम्हें मालूम तो होगा। संस्था की अध्यक्ष पायल सोनी ने कवियों का स्वागत किया।
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