2014 और इससे पहले तक के लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री पद के दावेदारों से लेकर प्रमुख दलों के नेता आमतौर पर कहते थे कि दिल्ली का रास्ता यूपी होकर जाता है। 11 मार्च को 2017 के विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद नेताओं के बोल और उनके स्लोगन बदल सकते हैं। इसकी वजह है।
चुनाव के सातवें और आखिरी चरण के लिए मतदान की तारीख आते-आते पूरा चुनाव 40 सीट के बजाय आठ सीटें जीतने-हराने की जोड़-तोड़ में सिमट गया है। दिल्ली से लेकर सात समंदर पार बैठा बनारसी-गैर बनारसी, हर व्यक्ति यही जानना चाहता है कि बनारस में क्या चल रहा है?
फिलहाल तीन दिन से काशी की सड़कों पर भाजपा समर्थक ‘नमो-नमो का जाप करो-गठबंधन को साफ करो’ के नारे लगा रहे हैं। वहीं सपा-कांग्रेस गठबंधन के समर्थकों का ‘यूपी को ये साथ पसंद है’ प्रिय स्लोगन है।
दरअसल, आखिरी दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से लेकर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने लगातार प्रचार और एक-दूसरे पर ताबड़तोड़ हमले कर वाराणसी और मिर्जापुर मंडल के छह अन्य जिलों की 32 सीटों से लोगों का ध्यान कम कर दिया है।
इसे नेताओं के ‘छिपी रणनीति’ के तहत आनन-फानन में तय किए जा रहे दौरों से समझा जा सकता है। राहुल गांधी-अखिलेश यादव का रोड शो सबसे पहले 11 फरवरी, फिर 27 फरवरी और अंतत: चार मार्च को तय हुआ।
मंशा कार्यकर्ताओं को ‘चार्ज’ करने और पीएम मोदी के प्रस्तावित कार्यक्रमों पर थी। दूसरी तरफ पीएम मोदी का पांच मार्च को वाराणसी में चुनावी सभा का कार्यक्रम बनाया गया।
बाद में चार से छह मार्च तक के लिए पीएम मोदी के ‘कुछ’ कार्यक्रम घोषित कर दिए गए। उधर, आनन-फानन में दो मार्च को पिंडरा विधायक अजय राय के लिए राहुल की सभा करा दी गई।