आदि शंकराचार्य को स्वयं शिव के अवतार में पूजा जाता है। उन्होंने भगवान शंकर आद्यशंकराचार्य के रूप में सनातन धर्म की पुनर्स्थापना के लिए चार धर्मपीठों की स्थापना की। मात्र 32 वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने धर्म की ध्वजा को संपूर्ण भारत में फहराया।
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने बताया कि शिव रहस्यम के नवम सर्ग में वर्णित है कि भगवान शंकर आदि शंकराचार्य के रूप में सनातन धर्म की पुनर्स्थापना के लिए प्रकट हुए थे। शंकर चरित्रम के अनुसार शंकर की आयु का लेखा मात्र आठ वर्ष का ही था। माता और गुरु की अनुकंपा से उन्हें 32 साल की आयु का वरदान प्राप्त हुआ। पौराणिक कथाओं के अनुसार काशी प्रवास के दौरान मणिकर्णिका घाट पर ही संन्यासी शंकर को भगवान शंकर ने चांडाल के स्वरूप में दर्शन दिए थे।
चांडाल स्वरूप में ही भगवान शंकर ने उन्हें ब्रह्मज्ञान का साक्षात्कार कराया था। संन्यासी शंकर को जब ज्ञान हो गया तो भगवान शिव ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए। भगवान शिव के आदेश पर उन्होंने काशी में उपनिषदों का भाष्य लिखा और धर्मपीठों की स्थापना का संकल्प लिया। श्री शंकर चरित्रम में चांडाल और संन्यासी शंकर के बीच के संवाद व घटनाक्रम का विस्तार से वर्णन किया गया है।