मान्यता है कि कार्तिक मास के समान कोई मास नहीं, सतयुग के समान कोई युग नहीं, वेदों के समान कोई शास्त्र नहीं और गंगा के समान दूसरा कोई तीर्थ नहीं हैं। कार्तिक मास पर्यंत श्रद्धालु गंगा स्नान करते हैं और पंचतीर्थ घाटों पर स्नान का अलग ही महत्व है।
प्रयागराज में संपूर्ण माघ माह के स्नान को जो पुण्य प्राप्त होता है वह पंचगंगा घाट पर मात्र एक दिन के स्नान से ही प्राप्त हो जाता है। कण-कण शंकर की नगरी काशी में कदम कदम पर तीर्थ विराजते हैं। ऐसे में पंचतीर्थ घाटों में सबसे प्रमुख है पंचगंगा घाट। यहां स्नान करने से पांच नदियों के स्नान का पुण्य मिलता है। कारण यहां पांच नदियों गंगा, जमुना, सरस्वती, धूतपापा और किरणा नदी का संगम है।
काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत डॉ. कुलपति तिवारी ने बताया कि पंच गंगा घाट के ठीक पहले जटार घाट पर किरणा नदी पत्थर की बेदी के नीचे से गंगा में मिलती है। वहीं कुछ दूरी पर घाट पर ही छोटे से मंदिर में धूत पापेश्वर महादेव विराजमान हैं। ठीक नीचे की ओर एक बेदी है जहां से गुप्त धूतपापा नदी गंगा में मिलती हैं। अहिल्या बाई ने यहां पत्थरों का नक्काशीदार दो एक हजारा दीपक का निर्माण कराया था जो देव दीपावली वाले दिन जलाया जाता है। काशी में स्थित सप्तपुरियों के अंतर्गत इस घाट को कांचीपुरी क्षेत्र माना गया है।