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धर्मसम्राट ने स्थापित किया द्वैत और अद्वैत में समन्वय

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सनातन धर्म में प्रचलित द्वैत और अद्वैत दो परस्पर विरोधी दर्शन में भी समन्वय स्थापित करने का श्रेय यदि किसी को जाता है तो वह महापुरुष थे धर्मसम्राट स्वामी करपात्री महाराज। उक्त विचार अयोध्या के प्रख्यात संत एवं जगद्गुरु वासुदेवाचार्य स्वामी विद्याभास्कर महाराज ने व्यक्त किए। वह बुधवार को दुर्गाकुंड स्थित धर्मसंघ शिक्षा मंडल के प्रांगण में चल रहे 113 वें करपात्र प्राकट्योत्सव के अवसर आयोजित कार्यक्रम को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। अयोध्या से ऑनलाइन जुड़े संत प्रवर ने कहा कि स्वामी करपात्री धर्म के साक्षात विग्रह थे।
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विशिष्ट अतिथि अयोध्या से ही जुड़े जगद्गुरु रामानुजाचार्य राघवाचार्य ने कहा कि स्वामी करपात्री जी केवल अच्छे विचारों का आदान प्रदान ही नहीं करते थे, अपितु सदाचार पर भी बल देते थे। विशिष्ट अतिथि संपूर्णानंद संस्कृत विवि के कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ल ने कहा कि स्वामी करपात्री जी वेद, शास्त्र और पुराणों के सबसे अच्छे व्याख्याता थे। सारस्वत अतिथि प्रो. रामयत्न शुक्ल ने कहा कि स्वामी करपात्री जी महाराज के पांडित्य और विद्वता से काशी के समस्त विद्वान प्रभावित थे। अध्यक्षता स्वामी शंकरदेव चैतन्य ब्रह्मचारी ने की।
महोत्सव में काशी के वेद के उद्भट विद्वान पं. लक्ष्मीकांत दीक्षित को अतिविशिष्ट करपात्र रत्न सम्मान से अलंकृत किया गया। शुक्ल यजुर्वेद के प्रकांड विद्वान पं. दीक्षित को धर्मसंघ पीठाधीश्वर शंकरदेव चैतन्य ब्रह्मचारी एवं धर्मसंघ के महामंत्री पं. जगजीतन पांडेय ने माल्यार्पण, दुशाला, अभिनंदन पत्र, श्रीफल एवं एक लाख रुपये का ड्राफ्ट प्रदान किया। वहीं करपात्र गौरव के लिए चयनित संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ल को भी सम्मानित किया गया।
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