मजलिस में नौहाख्वानों ने जब कभी गैरत-ए-इंसा का सवाल आता है, बिन्ते जेहरा तेरे पर्दे का ख्याल आता है... सुनाया तो अजादारों की आंखें नम हो गईं। अंजुमन हैदरी ने नौहाख्वानी और मातम किया। मजलिस में अंसार हुसैन, बाकर हुसैन, कालिम हुसैन, नासिर अब्बास, गाजी अब्बास, हादी हसन, बंदे अली आदि रहे।
इसके बाद ख्वातीन की मजलिस शुरू हुई। अफ्शां फातमा ने कर्बला की जंग का मंजर पेश किया। उस्ताद की बेटी जरीना फातमा और पोती कहकशां ने नौहेख्वानी पेश की। उन्होंने सुनाया, कयामे गम अगर माहे अजा दे, गमे शब्बीर में आंसू बहा दे...।
लखनऊ से आते थे अब्बा के दोस्त
उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की बेटी जरीना फातमा ने बताया कि इस मजलिस में लखनऊ से अब्बा के दोस्त भी शामिल होते थे। यहीं, हफ्ते भर तक रहते थे। हर रोज मजलिस में शिरकत करते और इमाम हुसैन की शहादत को याद करते थे। अब्बा पहले मीरनादे अली मस्जिद में मजलिस और रमजान की हर रवायत को निभाते थे। लेकिन, हम हमारा घर बन गया तब घर पर ही मर्दों और ख्वातीन की मजलिस होने लगी।