बीएचयू में आयुर्वेद पर दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन
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आयुर्वेद हमारी पूंजी है लेकिन आज इसकी चर्चा विदेशों में हो रही है। यूरोप और अमेरिका इस ओर तेजी से बढ़ रहे हैं लेकिन भारत में इसकी गति धीमी पड़ गई है और अगर इसमें सुधार नहीं लाया गया तो ऐसा भी संभव है कि आने वाले समय में अमेरिका और यूरोप के शिक्षक हमें आयुर्वेद पढ़ाएंगे। यह बातें पद्मश्री आयुर्वेदाचार्य प्रो. रामहर्ष सिंह ने कही। मौका था बीएचयू के केएन उडुप्पा सभागार में ‘रक्त दोष जनित व्याधियों में आयुर्वेद की भूमिका’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन का।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. रामहर्ष ने आयुर्वेद की पढ़ाई और उसमें लगने वाले समय पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद की पढ़ाई हमारे देश में साढ़े पांच- छह साल में पूरी हो रही है, अमेरिका और यूरोप में तीन साल में पूरी कराई जा रही है। इसलिए समय रहते इसमें सकारात्मक बदलाव करने होंगे। नहीं तो अमेरिका के शिक्षक हमें आयुर्वेद पढायेंगे। उन्होंने कहा कि चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में आधुनिक और आयुर्वेदिक पद्धतियों के बीच सार्थक संवाद होना जरूरी है।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि काशी विद्यापीठ के कुलपति डॉ. पृथ्वीश नाग ने कहा कि विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में आयुर्वेद व होमियोपैथ चिकित्सा को शामिल करने की कोशिशें चल रही हैं। जल्द ही कोई सार्थक परिणाम सामने आएंगे। राष्ट्रीय पंचकर्म एवं शोध संस्थान मुंबई के अध्यक्ष प्रो. यूएस निगम ने बताया कि तमाम विकारों और व्याधियों की चिकित्सा पंचकर्म श्रेष्ठ है।
प्रो. पीके गोस्वामी, प्रो. जेएस त्रिपाठी, प्रो. ओपी सिंह ने विचार रखे। संचालन डॉ. श्वेता मिश्रा और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. जेपी सिंह ने किया।